श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं।  आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः…। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं # 157 ☆

☆ मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः

मन ही मानव के बंधन और मोक्ष का कारण है। ये पंक्तियाँ जब सत्संग में सुनी तो बरबस आगे की चर्चा को मन आतुर हो उठा, सही कहा गया है कि मौसम के अनुसार रंग रूप बदलने की क्षमता केवल गिरगिट में ही नहीं महत्वाकांक्षी व्यक्तियों में भी पायी जाती है। ये आवश्यकता अनुसार परिवर्तन करते जाते हैं। अपनी गोटी किसी भी तरह जीत की ओर ले जानी है। इस समय सावन का महीना है। बारिश गर्मी की तपन को दूर करती है साथ ही साथ सूखे हुए वृक्ष व झाड़ियों में प्राण भर देती है। जीवंत हरियाली इसी की देन है। ग्रीष्म और शीत के बीच सेतु का कार्य ये बूंदे बखूबी कर रहीं हैं। जून, जुलाई, अगस्त, सितंबर ये चार माह धरती की प्यास को बुझा कर पूरे वर्ष भर का पानी एकत्र कर लेते हैं। शायद यही कारण है कि चौमासे में सारे कार्य तो बंद हो जाते हैं पर तीज त्योहार बहुत मनाये जाते हैं। मन है कि मानता नहीं वो अपनी चाहत को पाने हेतु कभी भी जोड़- तोड़ करने से नहीं चूकता।

समय के साथ -साथ प्रकृति ने भी अपने स्वरूप को बदलते हुए बारिश को कहीं बहुत अधिक तो कहीं बहुत कम कर दिया है। और ये अब केवल तीन महीनों में सिमट कर रह गयी है। वर्षा का चक्र भी अपनी बूंदों को सुरक्षित रखने की कोशिश करने लगा है।

चौमासे का अस्तित्व संकट में दिखना कहीं न कहीं संकेत है कि अगर वर्षा का मान नहीं रखा तो जल्दी ही बूंदों की संख्या कम होगी जिससे जीवन की गति अनछुई नहीं रह सकती।

मेरा तेरा के चक्कर में व्यक्ति इस तरह उलझा हुआ है कि क्या- क्या न बटोर ले, ये समझ ही नहीं पा रहा और लगा हुआ है लालच की जद्दोजहद में।

क्या आपने कभी गौर किया कि जिस चीज पर आपकी आसक्ति सबसे ज्यादा होती है वही चली जाती है, बात साफ है कि लगाव ही दुःख का कारण होता है इसलिए ईश्वर अपने भक्तों को वो नहीं देना चाहते जो उनके मोक्ष में बाधक बनें।

अतः हर स्थितियों में समभाव रखते हुए प्रसन्नता पूर्वक जिएँ और जीने दें।

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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