श्री अरुण श्रीवास्तव

(श्री अरुण श्रीवास्तव जी भारतीय स्टेट बैंक से वरिष्ठ सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। बैंक की सेवाओं में अक्सर हमें सार्वजनिक एवं कार्यालयीन जीवन में कई लोगों से मिलना   जुलना होता है। ऐसे में कोई संवेदनशील साहित्यकार ही उन चरित्रों को लेखनी से साकार कर सकता है। श्री अरुण श्रीवास्तव जी ने संभवतः अपने जीवन में ऐसे कई चरित्रों में से कुछ पात्र अपनी साहित्यिक रचनाओं में चुने होंगे। उन्होंने ऐसे ही कुछ पात्रों के इर्द गिर्द अपनी कथाओं का ताना बाना बुना है। प्रस्तुत है एक विचारणीय आलेख  “जीवन यात्रा“ की अगली कड़ी

☆ कथा-कहानी # 110 –  जीवन यात्रा : 5 ☆ श्री अरुण श्रीवास्तव ☆

ध्वनि मानवजाति का ही नहीं बल्कि विश्व के सभी जड़-चेतन प्राणियों के संप्रेषण का माध्यम है. ध्वनियों को सुनना जहां श्रवणशक्ति पर निर्भर है वहीं ध्वनियों को समझने की कला विभिन्न चेतन प्रजातियों की भिन्न भिन्न होती है. ध्वनि एक कंपन है जो वायु एवं द्रव्य अवस्था में तरंगों के माध्यम से प्रवाहित होती है. जहां मनुष्य की श्रवण क्षमता हाथ खड़ा कर देती है, वहीं पर कुछ जीव जंतु इन तरंगों को ग्रहण कर लेते हैं. भूकंपीय गतिविधियों को सबसे पहले यही समझते हैं और अपनी शैली में चेतावनी भी देने की कोशिश करते हैं, हालांकि मनुष्य प्राय: इन्हें दरकिनार कर देते हैं. वाक्शक्ति के मामले में मानवजाति अग्रणी है, तरह तरह की भाषाओं के अध्ययन में पारंगत भी बन चुकी है पर मर्म समझने की शक्ति सबकी अलग अलग होती है.

जब आंखें, अभिव्यक्ति के लिये असमर्थ लगें तो मनुष्य वाणी का प्रयोग प्रारंभ कर देता है. शिशु वत्स ने अपनी आयु के अनुसार ही अभिव्यक्ति के लिये वाणी का उपयोग करने का अभ्यास प्रारंभ कर दिया. शिशु अपने अधर युग्म का संचालन, जन्म के साथ ही सीख जाते है पर बोलने की प्रक्रिया ओंठो के खुलने से प्रारंभ होती है तो जब उसकी अभिव्यक्ति की कोशिश सफल हुई तो पहला शब्द निकला “मां”.

इस शब्द की परिभाषा नहीं होती पर ये शब्द जब जननी को पहली बार सुनाई देता है तो वह शिशु से जुड़ी सारी पीड़ा, असुविधा भूल जाती है. यह वो शब्द है जो हर नारी कभी न कभी अवश्य सुनना चाहती है. इसके आगे मधुरतम संगीत की सरगम भी बेसुरी लगती है. मां बेटे के लिये बहुत सारे पर्यायवाची शब्दों का, उपमाओं का प्रयोग करती है पर संतान के पास कोई विकल्प नहीं होता. मां या फिर अम्माँ, अम्मी, मम्मी या फिर मॉम जो भाषा, धर्म और संस्कृति के अनुसार अलग हो सकते हैं, बहुत से तो हम जानते भी नहीं होंगे पर अर्थ सार्वभौमिक है, भावना भी सार्वभौमिक ही होती हैं क्योंकि ये शिशु के पहले प्रयास से आता है जो कि उसके अंदर विद्यमान ईश्वरीय अंश का उसके लिये बहुत सूक्ष्म सहयोग होता है. 

क्रमशः…

© अरुण श्रीवास्तव

संपर्क – 301,अमृत अपार्टमेंट, नर्मदा रोड जबलपुर 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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