डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य – तुरत सेवा का सुख इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 297 ☆

☆ व्यंग्य – तुरत सेवा का सुख

मिसेज़ छाबड़ा ने पति को अखबार दिखाया, बोलीं, ‘देखो यह एड छपा है। घर के काम के लिए लेडी हेल्पर आधे घंटे में पहुंचेगी। झाड़ू पोंछा, बर्तन, किचिन की तैयारी। एक घंटे का चार्ज सौ रुपये। पांच मिनट का मार्जिन। एक घंटा पांच मिनट से ज्यादा होगा तो चार्ज दोगुना। वेरी इंटरेस्टिंग।’

फिर सोच कर बोलीं, ‘लेट अस गिव इट अ ट्राइ। अपनी केसर बाई तो तीन-चार दिन बाद ही गांव से लौटेगी। बहुत नागा करने लगी है। इसको बुलाकर देखते हैं।’

उनके पति छाबड़ा जी आदर्श पति हैं। पत्नी की बात का कभी विरोध नहीं करते। सोफे पर बैठे अखबार पलटते रहते हैं या टीवी देखते हैं। या फिर बैठे-बैठे झपकी लेते हैं। पत्नी जो देती है चुपचाप खा लेते हैं और जो पहनने को कहती है वही पहनते हैं। पत्नी से पूछे बिना कोई निर्णय नहीं लेते। टहलने जाते हैं तो पत्नी के पीछे-पीछे चलते हैं। कई बार पत्नी झिड़क देती है तो ‘आइ एम सॉरी’ कह कर चुप हो जाते हैं। बच्चे बाहर हैं, इसलिए घर में पति-पत्नी के सिवा कोई नहीं है।

मिसेज़ छाबड़ा ने निर्णय लेकर फोन कर दिया। करीब आधे घंटे में एक औरत, हांफती हुई, आ गयी। ‘गुड मॉर्निंग मैडम’, ‘गुड मॉर्निंग सर’ कहने के बाद एक कोने में ढेर हो गयी। हांफते हुए बोली, ‘मैडम, दौड़ती दौड़ती आयी हूं। प्लीज़ गिव मी फाइव मिनट्स। अभी काम शुरू करती हूं।’

करीब दस मिनट बाद वह उठ खड़ी हुई। मिसेज़ छाबड़ा से बोली, ‘मैडम काम दिखा दें और टाइम नोट कर लें।’ मिसेज़ छाबड़ा उसे काम समझा कर वापस सोफे पर बैठ गयीं।

दस पन्द्रह मिनट के बाद उनके दिमाग में कीड़ा कुलबुलाने लगा। कहीं काम धीरे-धीरे हुआ तो टाइम बढ़ जाएगा और चार्ज भी बढ़ जाएगा। वे उठकर औरत के पास खड़ी हो गयीं। बोलीं, ‘थोड़ा फुर्ती से काम करो। टाइम वेस्ट नहीं करना।’

औरत ने कोई जवाब नहीं दिया। मिसेज़ छाबड़ा फिर सोफे पर आ गयीं, लेकिन उन्हें चैन नहीं था। काम एक घंटे में पूरा होना चाहिए। वे हर दस मिनट में औरत के सिर पर खड़ी हो जाती थीं। ‘प्लीज़ थोड़ा फास्ट करो। टाइम बढ़ रहा है।’

तीन-चार बार टोकने पर औरत चिढ़कर बोली, ‘मैडम, हम इंसान हैं, मशीन नहीं हैं। जितना बन रहा है उतनी तेजी से कर रही हूं। आप उधर बैठो। काम खतम होने पर हम बताएंगीं।’

मिसेज़ छाबड़ा फिर सोफे पर। पति से बोलीं, ‘ये मेरा ब्लड-प्रेशर बढ़ा रही है। एक घंटे में काम फिनिश होना ज़रूरी है।’

छाबड़ा साहब ‘हांजी, आप दुरुस्त कहती हैं’ कह कर चुप हो गये।

एक घंटा पूरा होते ही मिसेज़ छाबड़ा ने औरत को रोक दिया। अभी किचिन का काम बाकी था। बोलीं, ‘बस रहने दो। किचिन का काम मैं कर लूंगी। तुम्हारे काम की स्पीड से मेरा ब्लड-प्रेशर बढ़ रहा है।’

औरत काम रोक कर खड़ी हो गयी, बोली, ‘मैडम, काम ज्यादा होगा तो टाइम तो लगेगा। उसमें हम क्या करेगी?’

मिसेज़ छाबड़ा बोलीं, ‘कोई बात नहीं। नेक्स्ट टाइम एक घंटे में पूरा करने की कोशिश करना। अगली बार हम आपको ब्रेकफास्ट और टी देंगे।’

औरत ‘ओके, थैंक यू’ कह कर चलती बनी।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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