श्रीमती सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “तिलांजलि”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २४१ ☆
🌻लघु कथा 🤲 तिलांजलि 🤲
पितृपक्ष का कड़ुवा माह। धर्म और आस्था को मानते – आज वह फिर जलाशय में जाकर कुश, तिल, जवा, चाँवल के दाने अंजलि भर तिलांजलि दे रहा था। मानो अपने पाप का प्रायश्चित कर रहा हो। निर्मल जल की धार में खड़े होकर मांग रहा था– हे प्रभु मेरे गुनाहों को माफ कर देना। मुझे अगले जन्म में फिर से अपनी माँ की कोख से जन्म ले सकूं। उसकी सेवा कर सकूं। इस जन्म में तो मैंने उन्हें बहुत कष्ट दिया है।
पंडित जी मंत्रोच्चार कर रहे थे– आपके इस पुण्य प्रताप से आपके माता जी को भगवान श्री हरि के धाम में जगह मिले।
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© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




