श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के आभारी हैं जो साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं।
आज प्रस्तुत है सुश्री संध्या जी द्वारा लिखित पुस्तक ““समय के आईने में…” – लेखिका… सुश्री संध्या अग्रवाल…” पर चर्चा।
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# १९० ☆
☆ ~ न्यूयार्क से ~ “समय के आईने में…” – लेखिका… सुश्री संध्या अग्रवाल ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
पुस्तक चर्चा
समय के आईने में
रचनाकार ..संध्या अग्रवाल
चर्चा विवेक रंजन श्रीवास्तव
☆ एक दार्शनिक एवं सांस्कृतिक अन्वेषण – – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
इस आलेख संग्रह में लेखिका ने जीवन के रोजमर्रा के क्षणों को न केवल दर्ज किया है बल्कि उन्हें एक ऐसे चश्मे से परखा है जो हमें बेहतर तरीके से बताता है कि हम कौन थे, कौन हैं और किन भूलभुलैयों में फँसते जा रहे हैं। पुस्तक का अंदाज़ सीधे-साधे संवाद से दूर है, वह दर्पण की तरह मिलता-जुलता, कभी क्रूर और कभी नम्र, पर हमेशा सच के निकट रहने की जिद पर टिका रहता है। लेखिका ने अपनी दीर्घदृष्टि में छोटे-छोटे अनुभवों को ऐसा पिरोया है कि पाठक को बार-बार वही पुराना सवाल सालता है, क्या हमने समय को समझा, या समय ने हमें समझाने की अपनी कला में हमारी असफलता की लंबीं सूची बना दी।
रचनाकार का शिल्प सूक्ष्म अवलोकन और सटीक भाषा का मेल है। वर्णन में रफ्तार ऐसी है कि वह हमें बीच-बीच में पढ़ना रोककर सोचने पर मजबूर कर देती है। किसी पात्र की एक अदायगी, किसी घटना का एक मामूली संवाद, हर छोटी चीज़ एक बड़े प्रश्न की तरफ संकेत करती है। अभिव्यक्ति के ताने-बाने में जो अर्थ छिपे हैं, उन्हें समझने के लिए पाठक को वही ध्यान देना पड़ता है जो लेखक ने पाठ में दिखाया है। यही वजह है कि पढ़ते समय बार-बार ऐसा लगता है कि लेखक केवल कोई घटना सुनाकर नहीं रह गया, वह हमें स्वयं का पुनर्मूल्यांकन करने का निमंत्रण दे गया है।
पुस्तक का एक प्रमुख गुण इसकी समयबद्धता है। समय यहाँ चलता-फिरता पात्र है जो अपने साथ समाज के मानक, परंपराएँ, और रोज़मर्रा की मोह भंग स्थिति लाता है। लेखिका ने पुराने और नए दोनों समय के चेहरों को एक मंच पर खड़ा कर के उनकी बातचीत करवाई है। यह बातचीत कभी तीखी व्यंग्य बनकर उठती है, तो कभी मद्धम, पर हमेशा चिंतन का आव्हान देती जाती है। समय के साथ टकराव में पैदा होने वाले अभाव और आश्चर्य दोनों का ही लेखिका ने समुचित रूप से विवेचन किया है। पाठक के लिए यह केवल कथा का आनंद नहीं रह जाता, बल्कि वह समय के प्रति अपने स्वभाव का निरीक्षण भी करने लगता है।
रचना में पात्रों का जीवंत उल्लेख है। वे किसी नाटक का बाहरी सेट नहीं, बल्कि हमारी कहानियों के भीतर जीते हुए लोग हैं। उनकी छोटी-छोटी आदतें, उनके शब्द, उनकी असफल प्रेमकथाएँ और नौकरी, त्यौहार, सब कुछ मानो हमारे आसपास की सड़कों, चाय की ठेलियों और सरकारी दफ्तरों की कतारों से उठाकर लाया हुआ है। इस वास्तविकता ने पाठक को किताब के पन्नों से फिर फिरवजुड़े रहने पर विवश किया है। लेखिका की संवेदना पात्रों के भीतर झांकते हुए समाज की विसंगतियों को भी उजागर कर देती है। कहीं पर यह व्यंग्य बनकर निकलता है, कहीं पर यह करुणा का रूप धारण कर लेता है, पर अंततः यह मानवता के प्रति सजगता ही साबित होता है।
भाषा कभी-कभी लोकोक्ति की मिठास के संग है, दार्शनिक विचलन कम है पर वैचारिकता लगातार बनी रहती है। लेखिका कहीं भव्य शब्दों में भटकती नही, वह सीधे उस मसले की गांठ खोलकर रख देती है जिसे हम अनदेखा करते आए हैं।
कथ्य संरचना में पहली दृष्टि में अलग दिखने वाले किस्से धीरे-धीरे एक दूसरे से जुड़े हुए प्रतीत होते हैं और अंततः एक व्यापक सामाजिक चित्र बनाते हैं। यह ब्रह्माण्डीकरण पाठक को थका कर नहीं छोड़ता, इसके विपरीत, यह तार्किक है। हर छोटा उपकथ्य अंततः मुख्य विषय की परिभाषा में योगदान देता है। इस तरह की रचना में लेखिका का नियंत्रण स्पष्ट है। वह जानती है कब अभिव्यक्ति की रफ़्तार बढ़ानी है और कब ठहरकर तत्कालीन भावना का स्वाद चखाना है।
पुस्तक की गंभीरता के बीच भी हास्य भी है। यह हास्य न केवल पाठक को हंसाता है, बल्कि उसे किसी कटु सत्य से अवगत कराता है जिसे स्वीकार करना हम टालते हैं। व्यंग्य कहे तो उसे साहित्य के भीतर एक सक्षम हथियार के रूप में इस्तेमाल किया गया है, जो सामाजिक बेरुखी और मानवीय दोहरावों पर वार करता है, पर कभी अपमानजनक नहीं होता। यह संतुलन ही लेखक की पकड़ की असली कसौटी है।
पठन के बाद मन में एक शेष भाव रहता है, समय के आईने में जो प्रतिबिंब उभरता है, वह स्थिर नहीं होता। वह बदलता रहता है और बदलते रहने की अपनी मजबूरी में हमें भी लगातार बदलने का आह्वान करता है। लेखिका ने यह नहीं कहा कि परिवर्तन आसान है, पर उसने यह स्पष्ट कर दिया कि बदलाव से इन्कार करना स्वयं को धोखा देना है। पुस्तक का अंतिम भाव पाठक को एक तरह की जागरूकता और जिम्मेदारी देता है, समय की धारा के साथ समझदारी से तैरने का, और अपनी छोटी-छोटी असमानताओं को पहचानने का आग्रह।
कुल मिलाकर यह कृति सोचने-समझने वालों के लिए एक समृद्ध बौद्धिक उपहार है। यह केवल पढ़ने की वस्तु नहीं, एक संग्रह योग्य संवाद है। समय से, समाज से और अंततः स्वयं से बातें हैं।
चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार
~ न्यूयार्क से ~
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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈







