श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है सुश्री विमला रस्तोगी जी द्वारा लिखित मुस्कुराता बचपन, सोचते माँ-बाप की समीक्षा।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २३०

पुस्तक समीक्षा :  मुस्कुराता बचपन, सोचते माँ-बाप – लेखिका: सुश्री विमला रस्तोगी  ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 

पुस्तक का नाम: मुस्कुराता बचपन, सोचते माँ-बाप

लेखिका: विमला रस्तोगी 

पृष्ठ: 132

मूल्य: ₹400

संस्करण: 2025

प्रकाशक: अनुराग प्रकाशन, 23 अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली- 110002

समीक्षक: ओमप्रकाश क्षत्रिय प्रकाश

– मुस्कराते बचपन की मार्गदर्शिका: मुस्कुराता बचपन, सोचते माँ-बाप –

बचपन की मुस्कानें तभी खिलती हैं जब उन्हें समझने वाले माँ-बाप हों—विमला रस्तोगी की यह पुस्तक “मुस्कुराता बचपन, सोचते माँ-बाप” इसी भावभूमि पर रची गई एक विचारशील कृति है, जो बाल मनोविज्ञान, अभिभावकत्व और सामाजिक बदलावों के बीच एक सेतु और मार्गदर्शिका का कार्य करती है।

लेखिका ने अपने अनुभव, संवेदना और सामाजिक दृष्टि से समृद्ध लेखों के माध्यम से यह स्पष्ट किया है कि आज का बचपन केवल खिलौनों और किताबों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह तकनीक, प्रतिस्पर्धा और सामाजिक दबावों के बीच जूझता हुआ बचपन है। ऐसे में माता-पिता की भूमिका केवल पालन-पोषण तक सीमित नहीं रह जाती, बल्कि उन्हें एक मार्गदर्शक, सहचर और संवेदनशील श्रोता की भूमिका भी निभानी होती है।

पुस्तक में लेखिका ने जिन विषयों को उठाया है, वह बहुत ही महत्वपूर्ण है —जैसे ‘बच्चे अपनाते हैं बड़ों की आदतें’, ‘हादसों के असर से बच्चों को उबारें’, ‘बच्चों को प्रकृति से जोड़ें’, ‘काल्पनिक खेल और बच्चे’, ‘आत्मकेन्द्रित बच्चे’—वे न केवल सामयिक हैं, बल्कि हर उस अभिभावक के लिए मार्गदर्शक हैं जो अपने बच्चे के सर्वांगीण विकास की चिंता करता है।

लेखिका की भाषा सरल, सहज, प्रवाहपूर्ण और आत्मीय है। कहीं भी उपदेशात्मकता नहीं है, बल्कि अनुभवजन्य उदाहरणों और संवेदनशील दृष्टिकोण के माध्यम से पाठक को सोचने के लिए प्रेरित किया गया है। विशेष रूप से ‘सेविन-सेविन-सेविन’ जैसे आधुनिक शहरी जीवन के उदाहरणों के माध्यम से लेखिका ने यह दिखाया है कि बच्चों को समय देना केवल एक दायित्व नहीं, बल्कि एक सजीव संवाद की आवश्यकता है।

इस पुस्तक की विशेषता यह है कि यह केवल बच्चों के लिए नहीं, बल्कि उनके माता-पिता, शिक्षकों और बाल साहित्यकारों के लिए भी एक दर्पण है—जो उन्हें यह दिखाता है कि वे अपने व्यवहार, समय और दृष्टिकोण से बच्चों के जीवन को कैसे प्रभावित करते हैं।

विमला रस्तोगी जी का यह प्रयास निश्चय ही बाल साहित्य और अभिभावक विमर्श के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण योगदान है। यह पुस्तक हर उस पाठक को पढ़नी चाहिए जो बच्चों के साथ जीवन को समझना और जीना चाहता है।

**

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

30/1/12025

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments