श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के आभारी हैं जो साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं।
आज प्रस्तुत है श्री अमरेंद्र नारायण जी द्वारा लिखित “सम्मान–पथ…” पर चर्चा।
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# १९२ ☆
☆ “सम्मान–पथ…” – लेखक… श्री अमरेंद्र नारायण ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
पुस्तक चर्चा
“सम्मान–पथ”( प्रेरक उपन्यास)
लेखक.. अमरेंद्र नारायण
प्रकाशन.. बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन
चर्चा विवेक रंजन श्रीवास्तव
☆ एक दार्शनिक एवं सांस्कृतिक अन्वेषण – – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
यह उपन्यास सुप्रसिद्ध चिंतक और वरिष्ठ लेखक अमरेन्द्र नारायण जी का समाज और व्यक्ति के बीच के रिश्ते को सम्मान, प्रेम और मूल्य चेतना के आधार पर पुनर्गठित करने का आग्रह है। इसमें लेखक समकालीन युवा की भटकी हुई आकांक्षाओं, भोगवाद और नैतिक संकट को केवल नियमों से नहीं, बल्कि “मन के शिक्षण” और सामाजिक सह अनुभूति से बदलने की बात करते हैं।
श्री अमरेन्द्र नारायण
लेखक ने यह शाश्वत सत्य प्रतिपादित किया है कि मन और विचार ही मानव जीवन का केन्द्र हैं। मन ही जीवन में सुख दुख, सफलताअसफलता और नैतिकता अनैतिकता की दिशा तय करता है। यदि मन को ज्ञान, विवेक और सकारात्मक अनुभवों से संयमित नहीं किया जाए, तो वही ऊर्जा स्वार्थ, हिंसा और विकृति में बदल जाती है। इसलिए मन का शिक्षण, चरित्र–निर्माण की पहली सीढ़ी माना गया है। उदाहरण के तौर पर लेखक बताता है कि आज के कई युवा ऊँचे पद और अधिक धन तो चाहते हैं, परन्तु अपने कर्तव्य, श्रम और समाज के प्रति जिम्मेदारी को गौण मान लेते हैं, जिससे उनके जीवन में खालीपन और असंतोष बढ़ता जाता है।
आधुनिक युवा पीढ़ी ऐसी सामाजिक स्थितियों से घिर गई है कि वह भोगवादी संकट से गुजर रही है।
पुस्तक में आज के युवा को तकनीक समृद्ध, परन्तु लक्ष्य विहीन और मानसिक रूप से अस्थिर बताया गया है, क्योंकि उसने “अदृश्य सुख” को ही जीवन लक्ष्य मान लिया है। वह उस मरीचिका के पीछे भाग रहा है। लेखक कथानक इस प्रकार बुनता है कि पाठक के सम्मुख स्पष्ट चित्र बनते चलते हैं। करियर, प्रतियोगिता और उपभोग के दबाव में युवा अपने भीतर की नैतिक शक्ति को भूल कर केवल तात्कालिक लाभ की दौड़ में शामिल होता दिख रहा है। वे संकेत करते हैं कि कुछ युवा तेज़ी से पैसा कमाने के लिए अनैतिक साधन अपनाते हैं, जबकि वही ऊर्जा, यदि समाज सेवा, राष्ट्र निर्माण या सृजनात्मक कामों में लगाई जाए, तो वे स्वयं भी संतुष्ट होंगे और समाज का भी कल्याण होगा। अमरेंद्र जी युवाओं में व्यवहारिक प्रेम, लज्जा और सामाजिक अनुशासन के उदाहरण देते हुए अपना मंतव्य कुशलता से पाठकों के सम्मुख रखते हैं।
किताब में कई सांस्कृतिक धार्मिक प्रसंगों और लोक परम्पराओं के उदाहरण से बताया गया है कि समाज पहले प्रेम, लज्जा और आपसी सम्मान से ही स्व नियंत्रित रहता था। एक स्थान पर नवरात्र या अन्य पर्वों के संदर्भ में वर्णन आता है कि किस तरह पूरा गाँव स्वच्छता, सादगी और सामूहिक पूजा अनुष्ठान के माध्यम से एक दूसरे के प्रति संवेदनशील और अनुशासित होता था। वहाँ नियमों से अधिक “संकोच” और “आपसी नज़र” लोगों को गलती से रोकती थी। एक अन्य प्रसंग में भजन कीर्तन और लोकगीतों के माध्यम से स्त्रियों की परस्पर भागीदारी, सामूहिक श्रम और साझा उत्सव का चित्रण है, जो दिखाता है कि संस्कृति केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि मूल्य संरक्षण का माध्यम भी है।
सम्मान पथ जीवन के समाधान का रास्ता सुझाता प्रेरक उपन्यास बन पड़ा है।
लेखक के अनुसार वर्तमान वैश्विक संकट की जड़ यह है कि युवा पीढ़ी ने “आत्मिक कार्य भाव” खो दिया और केवल निजी लाभ को छोड़ किसी बड़े उद्देश्य से नहीं जुड़ पा रही।
सच है आजादी के आंदोलन में अपनी जान दांव पर लगा देने वाली तत्कालीन युवा पीढ़ी ही तो थी।
इस उद्देश्य हीनता से सारी पीढी स्वयं हताश है और समाज में अपराध, हिंसा और भ्रष्टाचार बढ़ रहा है। इसलिए “सम्मान पथ” का मंतव्य है, अपने प्रति सम्मान, दूसरों के प्रति करुणा और समाज के प्रति कर्तव्य बोध को फिर से जन जीवन केन्द्र बनाना। लेखक ऐसे नागरिक की कल्पना करता है जो अपनी निजी सफलता के साथ साथ गाँव की सफाई, नशामुक्ति अभियान, स्त्री सम्मान या शिक्षा प्रसार जैसे कार्यों में भी सक्रिय रहे। उसके लिए यही वास्तविक “आत्म सम्मान” और “राष्ट्र सम्मान” है।
साहित्य का दायित्व और पाठक की भूमिका संप्रेषित करने में उपन्यास पूर्णतः सफल हुआ है।
पुस्तक इस निष्कर्ष पर पहुँचती है कि सिर्फ प्रश्न उठाने से समाज नहीं बदलता। साहित्य का दायित्व है कि वह दिशा भी दिखाए और पाठक के भीतर परिवर्तन की इच्छा जगाए। इसीलिए लेखक ने लेख, संस्मरण, धार्मिक प्रसंग और लोक गीतों का मिश्रण रचती शैली में स्वयं को अभिव्यक्त किया है। लेखक चाहता है कि पाठक केवल बौद्धिक बहस न करे, बल्कि भावनात्मक रूप से जुड़कर अपने जीवन में सम्मान, प्रेम और नैतिकता को सर्वोच्च जगह दे। इस अर्थ में “सम्मान पथ” प्रेरक और मूल्य केन्द्रित कृति है, जो आज के भटके हुए सामाजिक वातावरण में मनुष्य को फिर से मनुष्य बने रहने की राह दिखाने की कोशिश करती है।
किताब हर साहित्य प्रेमी को पढ़नी और गुननी चाहिए।
स्कूल, कॉलेज, ग्राम पंचायतों, सार्वजनिक पुस्तकालयों, हेतु किताब संग्रहणीय बन पड़ी है, जो प्रत्येक पाठक के मर्म को स्पर्श कर उसमें स्व परिवर्तन के भाव जगा सकेगी। भारतीय समकालीन संदर्भों में उपन्यासकार एक सामाजिक चेतना जगाने की महत्वपूर्ण भूमिका में कलम चलाते नजर आते हैं। बधाई।
चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार
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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






