डॉ. ऋचा शर्मा
(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में अवश्य मिली है किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित एक विचारणीय लघुकथा ‘गिरगिट‘। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद # १५८ ☆
☆ लघुकथा – गिरगिट ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆
विनम्रता की प्रतिमूर्ति, गुरु जी का वह आज्ञाकारी शिष्य। गुरु जी उसकी शालीनता से बहुत प्रभावित। वह कृतार्थ थे, मन ही मन सोचते ऐसे विद्यार्थी मिलते कहाँ हैं कलियुग में?
‘विद्या दान श्रेष्ठ दान’ मानकर और विद्यार्थी को योग्य पात्र समझकर गुरु जी यथासंभव सहयोग करते रहे। एक-एक कर इस विद्यार्थी के सब कार्य पूरे हो गए। उनकी कृपा से वह अच्छे पद पर नियुक्त भी हो गया। गुरु जी उसे अक्सर याद करते, मिलने को कहते पर वह अपनी व्यस्तता बताता रहा। मिलने न आने के हर बार नए कारण बन जाते। दरअसल गुरु जी से मिलने जाने का अब कोई कारण न रहा—?
गुरु जी लॉन में बैठे थे, सामने बड़ी देर से पेड़ पर निश्चल बैठा गिरगिट अब रंग बदल चुका था।
© डॉ. ऋचा शर्मा
प्रोफेसर एवं अध्यक्ष – हिंदी विभाग, अहमदनगर कॉलेज, अहमदनगर. – 414001
संपर्क – 122/1 अ, सुखकर्ता कॉलोनी, (रेलवे ब्रिज के पास) कायनेटिक चौक, अहमदनगर (महा.) – 414005
e-mail – richasharma1168@gmail.com मोबाईल – 09370288414.
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





