श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “सरकारी रोटी ”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५० ☆

🌻लघु कथा🌻 🫓 सरकारी रोटी 🫓

कड़कती ठंडक में कुछ भले नेताओं को आम जनता के लिए अलाव की सुविधा का ख्याल मन में आ ही जाता है। बड़े धर्मात्मा होते है। दो चार जगहों पर अलाव लगवा ही देते हैं।

नेता जी के घर के पास मैदान में अलाव लगाया गया। आते – जाते राहगीर थोड़ी देर हाथ- पैर सेकतें नजर आए।

अचानक व्हीलचेयर रिक्शा को धक्का लगाती, एक महिला जिसमें एक बुजुर्ग बैठे हुए थे, सामने बड़े कटोरे में गीला आटा मढ़ा हुआ रखा, जल्दी – जल्दी चली आ रही थीं।

बड़ी खुशी से थपोले मार चार छः रोटियाँ बनाई। हाथ पैर सेकें। शायद ठंड और भूख दोनों से राहत मिली।

सुबह-सुबह एक साथ वाला बोला – – हम तुम्हें सब कुछ बताते हैं। कल तुम्हें सरकारी रोटी मिली वो भी अलाव वाली। तुमनें बताया नहीं। घमासान लड़ाई। सरकारी अलाव वाली रोटियाँ का माजरा समझते फफक – फफक कर रो पड़े।

इससे तो अच्छा था हम पन्नी कागज जला कर ही रोटी बना लेती। कम से कम मार तो नही खाते।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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