डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम विचारणीय व्यंग्य – ‘नाकाबिल बेटा, काबिल बाप का‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३१८ ☆

☆ व्यंग्य ☆ नाकाबिल बेटा, काबिल बाप का…

तनसुख लाल को जब मूड आता है तब गरज कर बुलाते हैंं, ‘बल्लू,चलो इधर।’ बल्लू आता है तो हुक्म होता है, ‘गणित की कापी लाओ।’ कापी के पन्ने पलटे जाते हैंं। सब पहले जैसा ही मिलता है। सवाल कटे हैं, नंबर की जगह गोल-गोल अंडा बना है, नीचे अध्यापक जी लिखते हैं, ‘गणित में बहुत कमजोर है।’ तनसुख लाल बल्लू का कान पड़कर गर्दन पर थाप लगाते हैं। बल्लू चीखता, दीवारें हिलाता, अपने कमरे में दाखिल होता है। पीछे-पीछे आती है तनसुख लाल की कड़कती आवाज़, ‘मेरे घर में यह जाने कहां का घामड़ पैदा हो गया। एक मैं था कि गणित में हमेशा अपने दर्जे में अव्वल आता था। पूरे स्कूल में मेरी तारीफ होती थी। मास्टर मेरी इज्जत करते थे। और एक यह है कि एक सवाल भी सही नहीं कर पाता। नालायक मेरी नाक कटाये देता है। बेटा, सिवा गारा ढोने के तुम्हारे भाग्य में और कुछ नहीं है। कर लो बाप के जमाने में मजे, फिर बाप के बाप को रोओगे। जाने कहां की कुलबोरन औलाद पैदा हुई है!’

इसी प्रकार की स्पीच, कभी कुछ सुधार कर, कभी कुछ बिगाड़ कर, तनसुख लाल बल्लू को देते हैं और बल्लू भी स्वर बदल बदल कर चीखता रहता है— कभी स्थायी पर, कभी मध्यम पर, कभी पंचम पर। सुखरानी देवी जौजे तनसुख लाल साड़ी के पल्लू से बल्लू की आंखें पोंछती हैं, समझाती हैं, ‘बेटा, खूब पढ़ा करो। अपने बप्पा की तरह क्लास में अव्वल आया करो, नहीं तो लोग कहेंगे कि इतने काबिल बाप का इतना गधा लड़का पैदा हुआ।’ बल्लू क्या समझता है, क्या करता है यह तो परवरदिगार ही जानें, पर उसकी कॉपी में काटने के निशान, अंडे और मास्टर साहब के निर्देश ज्यों के त्यों रहते हैं, और इसीलिए तनसुख लाल हाथ चला कर अपने और बल्लू के दिमाग की तुलना करने लगते हैं और बल्लू, रोते-चीखते, कमरे में घुस जाता है।

एक दिन तनसुख लाल सपरिवार बाज़ार गये और एक बुज़ुर्ग से टकरा गये। तनसुख लाल ने झुक कर बुज़ुर्ग के चरण छुए। धर्मपत्नी और बल्लू को बतलाया, ‘ये पांडे जी हैं। इन्होंने स्कूल में मुझे पढ़ाया था।’ बुज़ुर्ग प्रसन्न हो गये, तनसुख लाल की पीठ थपकते हुए श्रीमती तनसुख लाल से मुखातिब होकर बोले, ‘बेटी, ये तनसुख स्कूल में बड़ा गधा था। पढ़ता लिखता था नहीं, दिनभर गुल्ली-डंडा खेलता था। गणित में हमेशा अंडा पाता था।’

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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जगत सिंह बिष्ट

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Kundan Singh Parihar

धन्यवाद, बिष्ट जी।