डॉ कुंदन सिंह परिहार
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य – ‘क्रान्तिकारी‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३१९ ☆
☆ व्यंग्य ☆ क्रान्तिकारी ☆
राशन की दूकान के सामने धक्कम धक्का और चीख पुकार मची हुई थी। कतार खूब लंबी थी। खुली धूप में खड़े लोगों के मुंह और कपड़े पसीने से गीले हो रहे थे।
लाइन में से एक मूंछों वाला युवक चिल्लाया, ‘अबे, इतनी देर क्यों हो रही है? जल्दी हाथ नहीं चला सकते क्या? एक आदमी पन्द्रह मिनट में निबट रहा है।’
अंदर से विक्रेता ने अपना चेहरा भीड़ से ऊपर उठाया, आंखें सिकोड़ कर बोला, ‘काम ही तो कर रहे हैं। मशीन बन जाएं क्या?’
मूंछों वाला फिर चिल्लाया, ‘यहां धूप में दो घंटे से सिंक रहे हैं। तुमको क्या है, तुम तो आराम से अंदर बैठे हो।’
जवाब मिला, ‘माल लेना है तो धूप पानी सब सहना पड़ेगा। यहां बहस करने की जरूरत नहीं है, जो कहना है जाकर अफसरों से कहो।’
मूंछों वाला ताव खाकर लाइन से बाहर आ या, हाथ नचा कर बोला, ‘अरे हम सब समझते हैं। बड़े बगुला भगत बनते हो। सब माल पीछे के दरवाजे से बाहर जाता है और जनता को बेवकूफ बनाया जाता है। भूल गये बेटा, जब सात दिन बड़ी हवेली में रहे थे।’
दूकान वाला आगबबूला हो गया, बोला, ‘यहां फालतू बातों की जरूरत नहीं है। माल लेना है तो चुपचाप लो, नहीं तो जाओ।’
बाकी लोग प्रशंसा के भाव से इस क्रांतिकारी को देख रहे थे जो दूकान वाले की बखिया उधेड़ रहा था।
मूंछों वाला फिर बोला, ‘देखूंगा बेटा, मैं फूड ऑफिसर के पास जाकर तेरी एक-एक पोल खोलूंगा। मैं तेरी रग-रग जानता हूं।’
तभी दूकान के भीतर से एक दूसरा आदमी आया और क्रांतिकारी की बांह थाम कर उसे अलग ले गया। दूर ले जाकर उसने क्रांतिकारी से रुपये, कार्ड और थैला ले लिये। फिर क्रांतिकारी को वहीं खड़ा छोड़कर वह दूकान में आया और रजिस्टर में उसका नाम चढ़ा कर उसका राशन तौलवाया। फिर उसने जाकर चुपचाप थैला, लोगों की ओर पीठ करके खड़े क्रांतिकारी को थमा दिया।
क्रांतिकारी ने शरीर की ओट में थैला छिपा लिया और फिर कनखियों से ‘क्यू’ में खड़ी जनता की ओर देखता हुआ वहां से खिसक गया।
© डॉ कुंदन सिंह परिहार
जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






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धन्यवाद, बिष्ट जी।