डॉ कुंदन सिंह परिहार
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य – ‘ये इश्क़ नहीं आसां‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३२२ ☆
☆ व्यंग्य ☆ ये इश्क़ नहीं आसां ☆
कुछ समय पहले मैंने महाराष्ट्र के एक स्कूल के प्राचार्य के बारे में लिखा था, जिन्होंने छात्राओं को शपथ दिलायी थी कि वे प्रेम-विवाह नहीं करेंगीं। अभी टीवी पर देखा कि मध्य प्रदेश के रतलाम ज़िले के एक गांव में गांववालों ने लड़कियों के भाग कर शादी कर लेने से त्रस्त होकर ऐसे लड़कों-लड़कियों और उनके परिवार वालों के खिलाफ अभियान छेड़ दिया है।
गांव के एक प्रवक्ता ने घोषणा की है कि भाग कर शादी करने वाले लड़के लड़कियों का सामाजिक बहिष्कार होगा। उनके परिवार को कोई मज़दूरी नहीं देगा, दूध और किराने का सामान, पंडित-नाई उन्हें मुहैया नहीं होंगे। इसके अलावा कोई ऐसे परिवारों की ज़मीन को लीज़ पर नहीं लेगा। गनीमत है कि प्रेमियों को सबक सिखाने के लिए गांव वालों ने कोई और बड़ा नुस्खा नहीं निकाला। गांव के एक पिताजी ने बताया कि उन्होंने अपनी दो बेटियों की पढ़ाई छुड़ा कर उन्हें घर में बैठा लिया है ताकि वे प्रेम के प्रदूषण से बची रहें। सुनकर बेगम अख़्तर की ग़ज़ल याद आ गयी— ‘अय मुहब्बत, तेरे अंजाम पे रोना आया।’
चचा ‘ग़ालिब’ ने नाहक ही लिखा— ‘इश्क पर ज़ोर नहीं, है ये वो आतिश ग़ालिब, जो लगाये न लगे और बुझाये न बने।’ अब इंतज़ाम हो रहा है कि यह मनहूस आग लग ही न पाये और अगर लग ही जाए तो तुरन्त ‘फ़ायर एक्सटिंग्विशर’ का इस्तेमाल किया जाए। कबीर भी फालतू ही लिख गये कि ‘जा घट प्रेम न संचरे, सो घट जान मसान; जैसे खाल लुहार की, सांस लेतु बिन प्रान।’ उधर मरहूम मेंहदी हसन व्यर्थ की टेर लगाये हैं— ‘दुनिया किसी के प्यार में जन्नत से कम नहीं।’ बुल्ले शाह भी अरण्य रॊदन कर रहे हैं— ‘बेशक मंदिर मस्जिद तोड़ो, पर प्यार भरा दिल कभी न तोड़ो।’
हमारे देश के कानून के हिसाब से लड़का लड़की 18 की उम्र पर पहुंचने पर ख़ुद मुख़्तार हो जाते हैं, यानी वे खुद निर्णय लेने और अपने निर्णय की जवाबदारी लेने में सक्षम हो जाते हैं। पश्चिमी देशों में युवा अपनी शादी होने पर अपना अलग घर बसा लेते हैं। वे अपनी ज़िन्दगी के निर्णय स्वयं लेते हैं। लेकिन हमारे यहां नाक का सवाल ज़िन्दगी भर बना रहता है। लड़का-लड़की को वही काम करना पड़ता है जिसमें ख़ानदान की नाक सलामत रहे। नाक की रक्षा में ‘ऑनर किलिंग’ की घटनाएं होती रहती हैं। परिवार के साथ-साथ समाज की नाक का भी ख़याल रखना पड़ता है। इसीलिए कई प्रेमी शादी के बाद अपनी जान बचाते फिरते हैं।
मुश्किल यह है कि प्रकृति ने सिर्फ नर- मादा पैदा किये, परिवार और विवाह संस्थाएं आदमी ने अपनी ज़रूरत के हिसाब से बनायीं। अब संस्थाएं आदमी के ऊपर हावी हैं। प्रकृति का संदेश स्पष्ट है कि नर-मादा मिलें और अपनी प्रजाति को जीवित रखें। इसीलिए प्रकृति ने स्त्री और पुरुष के बीच में आकर्षण पैदा किया है।
हम लैला-मजनूं, शीरीं-फ़रहाद, सोहनी-महिवाल, रोमियो-जूलियट के प्रेम की गाथाओं पर झूमने वाले लोग हैं। राजस्थान में श्रीगंगानगर के पास लैला मजनूं के मज़ार हैं जहां हर साल जून में मेला लगता है, जिसमें बड़ी संख्या में लोग पहुंचकर मन्नत मानते हैं। लेकिन जब अपने घर में कोई लैला,शीरीं या सोहनी पैदा हो जाती है तो संकट खड़ा हो जाता है।
प्रेम आदमी को कैसा मजबूर और बेबस करता है इसके संबंध में मुझे दीवान जर्मनी दास द्वारा लिखित ‘महाराजा’ पुस्तक का एक प्रसंग याद आता है। पंजाब की एक रियासत की राजकुमारी अपने राज्य के एक अधिकारी के प्रेम में पड़ गयी थी। राजकुमारी के महल के पीछे की चारदीवारी से सटा एक कुआं था। राजकुमारी के प्रेमी ने दीवार में एक सूराख बना लिया था जिसके द्वारा वह कुएं में उतरता था और फिर दूसरी ओर से राजकुमारी की परिचारिकाएं उसे ऊपर खींच लेती थींं। यह प्रेम प्रसंग बहुत दिनों तक चला, फिर प्रेमी के एक शत्रु ने भांडा फोड़ दिया और प्रेमियों की पकड़-धकड़ की कार्यवाही होने लगी। राजकुमारी प्रेमी के साथ कुएं में उतरकर महल से बाहर निकल गयी और वे राज्य के अधिकार क्षेत्र से बाहर निकल गये। अंत में इन प्रेमियों की ज़िन्दगी बहुत अभावों और कष्टों में गुज़री।
इन प्रेमियों की कथा पढ़कर सोहनी- महिवाल की कथा याद आती है। फ़र्क यही है कि राजकुमारी की कथा में प्रेमी कुएं में उतरता था जबकि सोहनी अपने प्रेमी से मिलने के लिए घड़े के सहारे चिनाब नदी पार करती थी। मशहूर शायर ‘जिगर’ ने इश्क़ के बारे में लिखा, ‘ये इश्क नहीं आसां, बस इतना समझ लीजे, इक आग का दरिया है और डूब के जाना है।’ इन दोनों कथाओं में आग की जगह पानी ने ले ली है।
इसी सिलसिले में इंग्लैंड के सम्राट एडवर्ड अष्टम याद आते हैं जिन्होंने अपनी तलाकशुदा प्रेमिका वालिस सिंपसन से शादी करने के लिए इंग्लैंड की गद्दी छोड़ दी थी।
प्रेमियों से हमदर्दी रखने वाले भी बहुत से लोग होते हैं। मेरे एक मित्र शादी से पहले अपनी पत्नी के बॉयफ्रेंड हुआ करते थे। पत्नी तब एक स्कूल में अध्यापिका थीं और प्रेमी जी रोज़ सड़क के किनारे धूप में खड़े होकर उनका इंतज़ार करते थे। जिस मकान के सामने वे खड़े रहते थे उसके मालिक ने द्रवित होकर एक दिन उनके लिए कुर्सी भेज दी थी।
परसाई जी ने ‘सुशीला’ उस लड़की को कहा था जो भाग कर शादी कर लेती है और बाप का पी.एफ. का पैसा उनके बुढ़ापे के लिए बचा लेती है। लेकिन ज़ाहिर है बहुत से बापों को परसाई जी यह परिभाषा रास नहीं आती। अभी तो लगता है कि जल्दी ही ऐसी स्थिति बनेगी जहां बिना वालदैन के अनापत्ति प्रमाण-पत्र के शादी मुकम्मल नहीं मानी जाएगी। शादी कराने वाले पंडित जी को भी दोनों पक्ष के मां-बाप की सहमति के बिना शादी कराने की मुमानियत होगी।
© डॉ कुंदन सिंह परिहार
जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




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धन्यवाद, बिष्ट जी।