श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है सुश्री विनीता राहुरीकर जी द्वारा लिखित  “इत्र में भीगी हथेलियाँ’…पर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# १९६ ☆

☆ “इत्र में भीगी हथेलियाँ…” – लेखिका… सुश्री विनीता राहुरीकर ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

पुस्तक चर्चा

पुस्तक – ‘इत्र में भीगी हथेलियाँ’

लेखिका – विनीता राहुरीकर

चर्चा – विवेक रंजन श्रीवास्तव

संवेदना की सुगंध और यथार्थ का अन्वेषण – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

कहानी-संग्रह ‘इत्र में भीगी हथेलियाँ’ समकालीन हिंदी कथा-साहित्य में अपनी विशिष्ट ‘तथ्य-केंद्रित’ दृष्टि और मानवीय ऊष्मा के कारण एक अनिवार्य हस्तक्षेप है। जहाँ एक ओर स्थापित कहानीकार जैसे प्रेमचंद सामाजिक यथार्थ के चितेरे थे और जैनेंद्र मनोवैज्ञानिक परतों के पारखी, वहीं विनीता जी इन दोनों धाराओं को आधुनिक जीवन की जटिलताओं के साथ जोड़ती अनुभव जन्य कहानी रचती हैं। उनकी कहानियाँ केवल कल्पना का विस्तार नहीं, बल्कि सूक्ष्म पर्यवेक्षण और जीवन के ठोस तथ्यों पर आधारित जीवंत दस्तावेज हैं।

रिश्तों में संवेदना और उत्तरदायित्व उनके कथानकों की विशेषता है।

संग्रह की शीर्षक कहानी ‘इत्र में भीगी हथेलियाँ’ पुरुष के जीवन में स्त्री (माँ, पत्नी, बेटी) की अपरिहार्यता को रेखांकित करती है। प्रभास का अकेलापन और अंततः अपनी बेटी की हथेलियों में अपनी माँ की उसी ‘नमी’ और ‘सुगंध’ को पाना, कहानी को  दार्शनिक ऊंचाई देता है। यहाँ मूल्य यह उभरता है कि परिवार में कोई भी रिश्ता ‘स्वतः’ नहीं चलता, वह निरंतर संवेदना और उत्तरदायित्व की मांग करता है।

इसी मूल्य को ‘लव यू विभू’ एक अलग धरातल पर ले जाती है। एक जांबाज कमांडो की शहादत और उसकी मंगेतर का देशप्रेम के प्रति समर्पण यह दिखाता है कि प्रेम केवल अधिकार नहीं, बल्कि एक-दूसरे के कर्तव्यों का साझा बोझ उठाना है।

स्त्री की आंतरिक शक्ति और रचनात्मक पहचान करती कहानियों में

विनीता जी के नारी पात्र पितृसत्तात्मक ढाँचों के बीच अपनी स्वतंत्र पहचान तलाशते हैं।

‘नीम की निबौरी’ की निमकी इसका श्रेष्ठ उदाहरण है। माँ की उपेक्षा और अभावों के बावजूद उसके भीतर का ‘सृजन’ और लोकगीतों के प्रति अनुराग उसे  आत्मिक शक्ति प्रदान करता है। ये शब्द यहाँ सटीक बैठते हैं कि “इस लड़की के भीतर जो सृजन है, उसका शब्दों में पूरा नक्शा संभव नहीं।”

वहीं, ‘माधुरी’ और अन्य कहानियों में वे सास-बहू के पारंपरिक रिश्तों को एक नई दृष्टि से देखती हैं। जहाँ बहू महसूस करती है कि उसकी सास को केवल एक ‘घरेलू संसाधन’ माना जाता है।  लेखिका यह मूल्य स्थापित करती हैं कि बदलती बहू के साथ-साथ एक ‘बदलती सास’ की भी जरूरत है जो अपनी जरूरतों और आत्म-सम्मान को पहचान सके।

बुजुर्ग, स्मृति और बदलता समाज

संग्रह की एक बड़ी विशेषता के रूप में मुखरित हुआ है। ‘साउथ टीटी नगर का सरकारी क्वार्टर’ और ‘चबूतरा’ जैसी कहानियाँ केवल ईंट-पत्थर के मकानों की कहानी नहीं हैं। जब ७० वर्षीय सरकारी क्वार्टर को तोड़ने का आदेश आता है, तो लेखिका मार्मिक टिप्पणी करती हैं “आज सिर्फ ईंटों की दीवारें नहीं गिरेंगी, बल्कि उन दीवारों पर टिके रिश्तों और संघर्षों की पूरी सभ्यता का अंत होगा।” कहानियों में इस तरह  परिदृश्य वर्णन, में लेखिका के अपने मंतव्य  मूल्यवान  हैं।

 भौतिक स्थान सिर्फ जगह नहीं, बल्कि सांस्कृतिक स्मृति-कोष भी हो सकते हैं। ग्रामीण गरिमा और अर्थ-व्यवस्था के अंतर्विरोध भी कहानियों में कहे गए हैं।

‘शहर के भीतर गाँव, गाँव के भीतर शहर’ कहानी ग्रामीण जीवन की गरिमा और आत्मनिर्भरता का प्रभावी चित्रण है। सुमित्रा जैसा पात्र, जो शहर में घरेलू कर्मचारी बनकर भी अपनी जड़ों और मिट्टी से जुड़ी रहती है, यह सिद्ध करता है कि शहर और गाँव एक-दूसरे के भीतर प्रवाहित होते हैं।

वहीं, किसान आत्महत्या की पृष्ठभूमि पर आधारित कहानियों में लेखिका मीडिया की ‘कैमरा संस्कृति’ पर कड़ा प्रहार करती हैं। वे दिखाती हैं कि जहाँ दुनिया के लिए यह एक ‘न्यूज़ फ्रेम’ है, वहीं घर की औरतें बिना किसी शोर के रोजमर्रा की अर्थ-व्यवस्था और जीवन की जद्दोजहद सँभालती हैं।इन कहानियों में प्रेम, करुणा और क्षमा-बोध दृष्टव्य है।

लगभग हर कहानी का अंत  एक सकारात्मक उजाले की ओर ले जाता है। ‘कच्ची अमिया-सी लड़की और मीठे गुड़-सा प्रेम’ जैसी कहानियों में प्रेम रूमानी आदर्श के बजाय एक मेहनत-भरा और जिम्मेदार अनुभव बनकर आता है। क्षमा-बोध और अपनी सीमाओं को स्वीकार करना ही वास्तविक परिपक्वता है, जो इस संग्रह की कहानियों के माध्यम से पाठकों के मन में उतरती है।

कुल मिलाकर, ‘इत्र में भीगी हथेलियाँ’ मूल्य-बोध का एक ऐसा संग्रह है जो यह स्थापित करता है कि संवेदनशील और साझेदार रिश्ते ही आधुनिक समाज की असली शक्ति हैं।

स्त्री का रचनात्मक व्यक्तित्व कठिन परिस्थितियों में और अधिक निखरता है।

बुजुर्गों और स्मृतियों की रक्षा, दरअसल मनुष्य की आत्मा की रक्षा है।

विनीता राहुरीकर की यह कृति अपनी भाषा की सहजता और तथ्यों की प्रामाणिकता के कारण लंबे समय तक याद रखी जाएगी। यह संग्रह सिद्ध करता है कि संवेदना की महक कभी फीकी नहीं पड़ती।

किताब पढ़ने, गुनने, योग्य भावना प्रधान कहानियों का गुलदस्ता है।

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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