डॉ कुंदन सिंह परिहार
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम एवं विचारणीय व्यंग्य – ‘तुमहिं छांड़ि गति दूसर नाहीं‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३२३ ☆
☆ व्यंग्य ☆ तुमहिं छांड़ि गति दूसर नाहीं ☆
देश में विपक्षी नेता और मुख्यमंत्री बड़ी सांसत में हैं। समझ में नहीं आ रहा है कि ‘मैं इधर जाऊं या उधर जाऊं। बड़ी मुश्किल में हूं कि मैं किधर जाऊं।’ वजह यह है कि धर्म का अश्व सरपट दौड़ रहा है और अपने धर्मनिरपेक्ष होने का दम भरने वाले नेता उसके पीछे घिसट रहे हैं।
पूरे राजनीतिक वातावरण में हड़कंप है। सत्ता पक्ष ने भव्य राम मंदिर बनवाकर उसका उद्घाटन किया, फिर प्राण-प्रतिष्ठा हुई, और अंत में मंदिर पर धर्म-ध्वजा फहरायी गई। यानी भक्तों को तीन तीन बार आनंदित होने का और भक्ति रस में डूबने का मौका मिला। विरोधी दल सत्ता पक्ष की यह तुरुप चाल देखकर बेबस बिलबिलाते रहे। दर्शन करने नहीं गये तो राम-विरोधी होने का ठप्पा लगा। जनता के आक्रोश से बचने और ‘डैमेज कंट्रोल’ के लिए बड़े नेताओं ने छुटभइयों को भेज दिया।
इसके पहले महाकुंभ में अपनी सारी शक्ति झोंक कर सत्ता पक्ष साबित कर चुका था कि उसकी राजनीति के लिए धर्म का कितना महत्व है। उस समय भी कुंभ में न नहाने पर विपक्षियों की लानत-मलामत हुई थी।
सत्तापक्ष को धर्म के बल पर मैदान मारते देखकर विपक्षी अकबकाये हैं। भारत धर्मप्रधान देश है, इसलिए धर्म के दांव की काट ढूंढ़ पाना मुश्किल है। ‘उगलत निगलत पीर घनेरी’ वाली स्थिति है। धर्मनिरपेक्षता की बात करने वालों की ज़बान फिलहाल लड़खड़ा रही है। सब यह साबित करने में लगे हैं कि वे नास्तिक नहीं हैं, वे भी दूसरों के बराबर रामभक्त हैं, लेकिन वे रामभक्ति का दिखावा नहीं करते। इसी चक्कर में राहुल गांधी को मंदिर मंदिर जाना और अपना जनेऊ दिखाना पड़ रहा है।
अपनी ज़मीन ख़तरे में देखकर समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने अपने गृह नगर सैफ़ई में 50 फुट की भगवान कृष्ण की मूर्ति बनवायी है। यानी रघुवंशी राम के मुकाबले यदुवंशी कृष्ण को खड़ा किया है। उम्मीद है कि भगवान कृष्ण की कृपा से कम से कम यादवों का वोट पुख़्ता रहेगा।
उधर अभी तक आत्मविश्वास से भरीं, सत्ता को चुनौती देने वालीं ममता दीदी का आत्मविश्वास अब दरकने लगा है। कुछ दिनों पहले उन्होंने अपनी धार्मिकता दिखाने के लिए मंच पर चंडी की सतुति की थी। अभी पढ़ा कि दीदी ने सिलीगुड़ी के एक कस्बे में महाकाल की दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा का शिलान्यास किया। लगता है जैसे सभी नेता एक सुर में गा रहे हैं— ‘शरण में आये हैं हम तुम्हारी, दया करो हे दयालु भगवन।’ धर्म की राजनीतिक उर्वरता देखकर बंगाल में बाबरी मस्जिद के जिन्न को बोतल से बाहर निकाला गया है, जिसके जवाब में तत्काल गीता पाठ का कार्यक्रम हुआ।
यह भी पढ़ा कि राजस्थान के नाथद्वारा के करीब गोवर्धन पर्वत पर हनुमान जी की 111 फुट ऊंची, उत्तर भारत की सबसे ऊंची मूर्ति बन रही है, जिसे 10 किलोमीटर दूर से देखा जा सकेगा। उधर बिहार के चंपारण में दुनिया के सबसे बड़े 33 फुट ऊंचे शिवलिंग की स्थापना की गयी है। इस शिवलिंग का निर्माण तमिलनाडु में हुआ, जिसमें 10 साल लगे।
सभी विपक्षी दल अपनी खोयी हुई ज़मीन हासिल करने की जद्दोजहद में लगे हैं और सत्तादल उन पर व्यंग्य करने का कोई मौका नहीं चूक रहा है। गड़बड़ यह हो रही है कि अपने को धार्मिक साबित करने की होड़ में ज़रुरी मुद्दे पीछे छूट रहे हैं। बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार, हवा-पानी, शिक्षा- स्वास्थ्य, पेपर लीकेज के मुद्दों पर से नज़र हट रही है। सब धर्म की गंगा में डुबकी लगाने को ही अक्लमंदी मान रहे हैं। स्थिति को देखकर शायर साक़िब लखनवी का शेर याद आता है— ‘बाग़बां ने आग दी जब आशियाने को मिरे, जिन पे तकिया था वही पत्ते हवा देने लगे।’
देश का युवक पूरी तरह भ्रमित और परेशान है। अयोध्या में एक युवक का वक्तव्य सुना कि युवाओं को नौकरी के लिए कहीं जाने की ज़रूरत नहीं है,अयोध्या में ही भक्तों को चंदन लगाकर दो चार सौ रुपये रोज़ पैदा किये जा सकते हैं। प्रयाग के माघ मेले में एक बाबा, जो नौवीं पास बताये जाते हैं, साढ़े तीन और चार करोड़ की कारों में घूम रहे हैं। एक और बाबा पांच करोड़ के सोने के ज़ेवर शरीर पर लटकाये घूम रहे हैं। उनकी शिक्षा भी कार वाले बाबा की पढ़ाई के आसपास बतायी जाती है। उधर अपराधी जेल से लोगों के पास दस करोड़ की वसूली के नोटिस भेज रहे हैं। हत्या और बलात्कार के मामलों में सज़ा काट रहे सिरसा वाले संत जी को 8 साल 4 महीने में 15 बार पैरोल मिली है, जिसका सदुपयोग वे भक्तों को प्रवचन देने में करते हैं। जब भी जेल से निकलते हैं, शान से काफिले में चलते है। अब वे दिन लद गये जब पाप करने वाला मुंह छिपाता फिरता था। अब पाप करने वाला तन कर, मूंछों पर ताव देता चलता है। देश के बैंकों से हज़ारों करोड़ लेकर भागे चतुर लोग विदेश में ऐश कर रहे हैं और अपनी पार्टियों की फोटो डालकर यहां की जनता को मुंह चिढ़ा रहे हैं।
ऐसे मैं देश का पढ़ा-लिखा युवा चक्कर में है कि वह किसकी तरफ देखे और किस से कोई उम्मीद करे। प्रसंगवश बता दूं कि एक बाबा छात्रों को बिना पढ़े पास होने का नुस्खा बता चुके हैं। सिद्ध हुआ कि देश के युवा को रोज़गार का कोई अन्य विकल्प भले ही न मिले, बाबा बनने का शानदार विकल्प तो खुला ही है।
© डॉ कुंदन सिंह परिहार
जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




