श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४०१ ☆
न्यूयॉर्क से ~ कथा कहानी – स्नो मैन
श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
(वैश्विक परिदृश्य पर मेरी नई कहानी)
सुबह की धूप फार्म हाउस की लाल ईंटों पर पड़ रही थी , एक कतरा धूप बिना इजाजत , खिड़की पार कर मनोज जी की तख़त तक उन्हें जगाने चली आई थी। उनके चेहरे पर धूप पड़ते ही उनकी आँख खुली। नहीं, अलार्म ने नहीं जगाया। उन्हें आदत थी, सूरज के साथ उठने की, पिछले चालीस साल से। फर्क इतना था कि पहले उठते ही बच्चों की हँसी सुनाई देती थी, अब खिड़की के बाहर चिड़ियों की आवाज़ आती है।
वह उठे, चाय बनाई। खुद के लिए। केतली में दूध उबलते देखा तो याद आया, एमा को दूध की झाग बहुत पसंद थी। “दादू, देखो, क्लाउड!” कहकर चम्मच से झाग उठाकर हवा में उड़ाती थी। रॉनी कहता था, “एमा, स्टॉप इट!” लेकिन खुद भी हँसता था। वह एमा से तीन वर्ष बड़ा था ।
चाय लेकर वह बरामदे में आए। लॉन में ओस की बूँदें चमक रही थीं। सामने अमलतास के पेड़ पर गौरैया चहचहा रही थी। बगल में कुएँ से पानी खींचने की मोटर चालू हुई। रामस्वरूप ने आज भी समय पर बगीचे में सिंचाई के लिए पानी लगा दिया, केवल पंप का बटन ही तो स्विच आन करना था ।
“नमस्ते, साहब!” रामस्वरूप ने दूर से हाथ जोड़े। बीस साल से वह मनोज के यहाँ माली है।
“रामस्वरूप, गुलाबों की कटाई-छँटाई कर दो आज। इस सर्दी में फूल नहीं आए ठीक से।”
“जी साहब। कल ही सोच रहा था।”
रामस्वरूप कटर लेकर काम में लग गया। मनोज की नज़र लॉन के बीचो बीच खाली जगह पर ठहर गई। वहाँ कुछ नहीं था। सिर्फ़ सूखी घास। लेकिन मनोज को लगा, वहाँ एक स्नोमैन खड़ा था।
तीन साल पहले। अमेरिका। विस्कॉन्सिन का वह भव्य फार्म हाउस, उनके बेटे राजेश का ।
दिसंबर की सुबह थी। खिड़की के बाहर बर्फ़ गिर रही थी। रॉनी और एमा ने शोर मचा रखा था। “दादू! दादू! इट्स स्नोइंग!” एमा ने उनकी गर्दन में हाथ डाल दिया। रॉनी पाजामा पहने ही बाहर भागने को तैयार। बहू रोजी चिल्लाई, “रॉनी, जैकेट और बूट पहनो पहले!”
नाश्ते के बाद सब बाहर निकले। बर्फ़ सचमुच जादू थी। एमा ने जीभ बाहर निकालकर बर्फ़ के फाहे पकड़ने की कोशिश की। रॉनी ने स्नोबॉल बनाकर निशाना लगाया – पापा पर। बहू रोजी ने कैमरा निकाल लिया।
फैमिली ग्रुप विथ दादा जी, उसने डेट, प्लेस , टाइमर ऑन करके फोटो क्लिक की थी ।
“चलो, स्नोमैन बनाते हैं!” मनोज ने ऐलान किया।
अगले एक घंटे में दुनिया का सबसे सुंदर स्नोमैन बना। हर बच्चे केवल अपने बनाए स्नो मैन को ही सदा से वर्ल्ड बेस्ट कहते आए हैं।
रॉनी ने बड़ा गोला बनाया, एमा ने बीच वाला, मनोज ने सबसे ऊपर वाला। रोजी ने रसोई से गाजर ला दी। राजेश ने कोयले के दो टुकड़े ढूँढ़े, आँखें बनाने के लिए । एमा ने अपनी क्रिसमस वाली लाल टोपी , स्नोमैन को पहना दी थी। रॉनी ने कहा, “इसे टाई भी चाहिए!”
मनोज ने अपनी पुरानी धारीदार टाई निकाली। वही टाई जो उन्होंने राजेश की ग्रेजुएशन सेरेमनी में पहनी थी। टाई स्नोमैन के गले में लपेट दी। एमा ने तालियाँ बजाईं। “डैडी, लुक! अवर स्नोमैन इज़ सो हैंडसम!”
स्नोमैन का नाम रखा गया – फ्रॉस्टी।
मनोज जी ने बाजू में ही एक मंदिर नुमा आकृति बर्फ से बना दी , और इस तरह मानसरोवर के शिव अमेरिका में प्रतिष्ठित हो गए थे, मनोज के मन ही मन में।
हफ्ते भर से ज्यादा ही फ्रॉस्टी खड़ा रहा। रॉनी हर दिन कई चक्कर उसके पास जाता, “हाउ आर यू, फ्रॉस्टी?” एमा उसे कुकीज़ खिलाने की कोशिश करती। सब उसके चारों ओर खड़े होकर वीडियो और तस्वीरें लेते।
मनोज बताते, “हम भी जब नैनीताल में थे, तुम्हारे पापा छोटे से थे तब वहां स्नो फाल होता था , पर इस स्नो स्टॉर्म की तरह नहीं।”
तीसरे दिन धूप निकली।
एक तरफ सफेद बर्फ की ठंडी चादर और जस्ट कंट्रास्ट ब्राइट सनी डे , मनोज के लिए भी यह अनुभव नया सा था ।
उन्हें घरों में एंट्री पर डबल डोर , और चौबीस घंटे हीटिंग का महत्व समझ आ रहा था।
रात को आसमान से बर्फ झरती पर परावर्तन के चलते रोशनी ऐसी तेज रहती की जैसे चांद तारे खुद जमीन पर उतर रहे हों।
आसमान बिना पक्षियों के सूना सूना था । पेड़ो की डालियों पर पत्ते नहीं सफेद बर्फ चिपकी हुई थी।
कभी कुछ भी स्थाई नहीं रहता । प्रकृति इसी लिए चेतन कही जाती है । मौसम ने करवट ली,
पहले फ्रॉस्टी का सिर थोड़ा झुका, फिर टोपी फिसली, फिर नाक ढीली पड़ी। एमा रो पड़ी। “फ्रॉस्टी इज डाइंग!”
मनोज ने उसे गोद में उठाया। “नहीं बेटा, वह नहीं मर रहा। उसने अपने जिम्मे की सारी खुशियां हमें बांट दी है, अब वह लौट रहा है, बादलों में। अगली बर्फ़ में वह फिर आएगा, इसी तरह और खूब सी खुशियां फैलाने।”
एमा ने आँखें पोंछीं। “प्रॉमिस?”
“गाड प्रॉमिस।” मनोज बोले थे।
अगली सुबह स्नो मैन की जगह सिर्फ़ गीली ज़मीन थी, एक लाल टोपी, एक धारीदार टाई , गाजर और कोयले के दो टुकड़े बचे रह गए थे।
मनोज किसी गहरी सोच में खोए हुए थे ।
“साहब, चाय ठंडी हो रही है।”, मनोज चौंके। रामस्वरूप सामने खड़ा था। चाय की प्याली उसके हाथ में थी, चाय ठंडी हो रही थी।
“हाँ, हाँ। रख दो इधर।”
रामस्वरूप ने झाड़ियों की ओर देखा।
“साहब, अमेरिका में भी ऐसे ही बगीचे थे क्या?”
मनोज मुस्कुराए। “वहाँ ऐसे बगीचे तो नहीं थे। वहाँ खेती के मैदान थे। जो बर्फ का बड़ा सा फुसफुसा टर्फ बन गया था । पैर पड़ते ही सफेदी धंस जाती थी ।
उस पर था खुशियां बांटता एक स्नोमैन खड़ा कर दिया था, बच्चों ने।”
“स्नोमैन?”
“हाँ। बर्फ़ का बना आदमी। इसे बच्चे बनाते हैं। गाजर की नाक, कोयले की आँखें।”
तुम इसे ऐसे समझ जाओगे, जैसे यहां संगम में गीली बारीक रेत से बच्चे घरौंदे और पुतले बनाते हैं, वैसे ही बड़े सफेद बर्फ के पुतले , बनाने वाले की मर्जी के मुताबिक ।
रामस्वरूप को हँसी आ गई। “बर्फ़ का आदमी! और वह पिघलता नहीं?”
उसने कौतूहल व्यक्त किया।
“पिघलता है। पर ठंडे मौसम में हफ्ते दस दिन बना रहता है। धूप आते ही , धीरे धीरे पिघल जाता है। बच्चे रोते हैं। फिर अगली बर्फ़बारी का इंतजार करते हैं।
फिर दूसरा बना लेते हैं।”
रामस्वरूप ने सिर हिलाया। वह काम पर लौट गया। मनोज फिर उस खाली जगह को देखने लगे।
गंगा अंदर से आई। बर्तन साफ़ कर चुकी थी। “साहब, खाना क्या बना दूं आज?”
“जो बनाना है, बना दो गंगा। मुझे क्या पता।”
गंगा चली गई। पिछले छह महीने से वही हाल था। अकेले खाने का स्वाद ही नहीं रहा। पत्नी न हो तो घर घर नहीं लगता। बच्चे न हों तो घर सुनसान हो जाता है। पर सबका जाना ही नियति है , स्नोमैन के पिघलने के समान ।
अब तो मनोज जी अकेले ही रह गए थे पत्नी श्यामली को गए भी चार साल हो गए हैं।
शाम को फोन की घंटी बजी। वीडियो कॉल था।
“हाय, पापा! कैसे हैं?”
“ठीक हूँ।”
“सब ठीक तो है? दवा समय पर ले रहे हैं न, खाना ठीक से खा रहे हैं?” राजेश ने चिंता जताई ।
“हाँ, हाँ। गंगा बना देती है।” मनोज बोले।
बीच में एमा कूद पड़ी। “दादू! दादू! आज स्कूल क्राफ्ट में मैंने स्नोमैन बनाया , पेपर का!”
मनोज के चेहरे पर रौनक आ गई। “वाह! दिखाओ तो!”
एमा ने कागज़ का स्नोमैन दिखाया। गोल-गोल, लाल टोपी, ऑरेंज कलर की नाक। मनोज की आँखें भर आईं।
“बहुत सुंदर बनाया, बेटा। बिल्कुल अपने फ्रॉस्टी जैसा।”
“दादू, आप कब आ रहे हैं यहाँ? फिर स्नोमैन बनाएँगे साथ में!”
मनोज चुप रहे। कैसे बताएँ कि अब वहाँ नहीं जा सकते। वहाँ की ज़मीन उन्हें अच्छी नहीं लगती। वहाँ वह खुद को बर्फ़ के उस स्नोमैन की तरह महसूस करते हैं जो धूप में पिघल रहा हो। यहाँ कम से कम धूप तो अपनी है। मिट्टी तो अपनी है।
“जल्दी आऊँगा, बेटा।”
फोन रखते ही सन्नाटा और गहरा गया।
अमलतास पर चिड़ियाँ सो चुकी थीं। रामस्वरूप जा चुका था। गंगा भी चली गई। फार्म हाउस में सिर्फ़ मनोज थे और उनकी परछाइयाँ।
रात के खाने में उन्होंने रोटी नहीं खाई। बस दूध पिया और बरामदे में आ बैठे। ठंड बढ़ गई थी। सर्दियों की रातों में यहाँ शहर से बाहर फार्म हाउस में मौसम अमेरिका जैसा ही ठंडा हो जाता है। बस बर्फ़ नहीं गिरती। बस कमरों में वैसी ऊष्मा बनाए रखने वाले हीटर नहीं होते।
उन्होंने ऊनी मफलर लपेटा। वही जो रोजी ने पिछले साल भेजा था। उनकी नज़र फिर लॉन के बीचोबीच गई। वहाँ अब भी कुछ नहीं था। लेकिन उन्हें वहाँ एक पहचानी सी धुँधली आकृति दिख रही थी ।
स्नोमैन!
बर्फ़ का नहीं, यादों का। उसके गले में धारीदार टाई थी, सिर पर लाल टोपी, गाजर की नाक, कोयले की आँखें। वह मुस्कुरा रहा था। मनोज को लगा, वह स्नोमैन उन्हें देख रहा है।
दो अकेले प्राणी। एक ठंडी रात में। एक यहाँ, एक वहाँ। दोनों पिघलने के इंतज़ार में।
मनोज ने धीरे से कहा, “हैलो, फ्रॉस्टी।”
हवा में सनसनाहट हुई। जैसे कोई जवाब दे रहा हो।
“तुम भी यहाँ? मैंने सोचा तुम अमेरिका में ही रह गए।”
एक पत्ता हवा में उड़कर लॉन के बीचोबीच गिरा। मनोज ने देखा, वह पत्ता स्नोमैन के पैरों के पास गिरा था। उन्हें यकीन हो गया, वह वहाँ है। सच में है।
“पता है, फ्रॉस्टी, मैं भी तुम्हारी तरह हूँ। बच्चों ने बनाया, बच्चों ने सजाया, बच्चों ने प्यार किया। फिर समय की धूप आई और मैं पिघलने लगा हूं। फर्क इतना है कि तुम पूरी तरह पिघल गए, मैं आधा-अधूरा रह गया हूँ।”
आँखों से आँसू ढुलक पड़े। उन्होंने पोंछे नहीं।
“लेकिन तुम्हें पता है, फ्रॉस्टी, मुझे कोई गिला नहीं। बच्चों ने मुझसे जितनी खुशियाँ लीं, उतनी ही तो मैंने भी लीं। रॉनी की हँसी, एमा की बातें,राजेश की चिंता, रोजी का ध्यान। श्यामली के बाद यही सब तो मेरे पास है। यादों में।
तुम्हारी तरह, मैं भी हर बर्फ़ में लौटूँगा या नहीं, मुझे पता नहीं ।
रात और गहरी हुई। ठंड और बढ़ी। मनोज की पलकें झुकने लगीं। वह कुर्सी पर ही सिमट गए। मफलर लपेटे। स्नोमैन अब भी वहाँ खड़ा था। दोनों एक-दूसरे को देख रहे थे। दो स्नोमैन। एक बर्फ की यादों का, एक मनोज खुद। दोनों पिघल रहे थे।
बाहर अमलतास पर एक रंगीन चिड़िया बैठी थी। लाल टोपी जैसी।
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© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार
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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






