श्री एस के कपूर “श्री हंस”

 

☆ “श्री हंस” साहित्य # १९७ ☆

☆ गीत ।। पैसों के लिए दोस्ती, पैसे का याराना है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

पैसों के लिए दोस्ती पैसे का याराना है।

आ गया यह कैसा  अजब सा जमाना है।।

***

पैसे की गुलाम बनती   जा रही है दुनिया।

मतलब परस्त सी ढलती जा रही है दुनिया।।

अच्छे कर्मों से अब नाम नहीं कमाना है।

पैसों के लिए दोस्ती, पैसे का याराना है।।

****

कुछ के अच्छे कर्मों से संसार चल रहा है।

मानवता नाम अभी जिंदा सा लग रहा है।।

रिश्ते भी दिखते जैसे पैसों का दोस्ताना है।

पैसों के लिए दोस्ती,  पैसे का याराना है।।

***

भूल गए लोग किअपनों का साथ जरूरी है।

सुख बढ़ता दुख बंटता यह इसकी दस्तूरी है।।

बना आज कल जिंदगी का गजब फसाना है।

पैसों के लिए दोस्ती, पैसे का याराना है।।

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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