आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’
(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि। संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी – ग़ज़लिका।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २७० ☆
☆ ग़ज़लिका ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆
(छंद दोहा, भाषा हिंग्लिश)
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पढ़ी तुम्हारी फेस बुक, बाँच लिया मैसेज।
मन मोबाइल ने हुलस, किया तुम्हें एंगेज।।
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मन मीठी मनुहार भर, करता रहा कमेंट।
गिरा रहा बिजली निठुर, मधुमेही परहेज।।
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चुटकी काटी ख्वाब में, कर तेरा दीदार।
गुझिया खाई-खिलाई, करी शुगर मैनेज।।
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रँगे रुपहले बाल जब, पूछ रहे थे गाल।
हमको रँगने का कहो, कहाँ खो गया क्रेज।।
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ड्रीम दिखा मिल गा रहे, ड्युएट चढ़ाए भाँग।
चढ़ी न उतरी दिलजले, सैल्फी रहे सहेज।।
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आई कह आई नहीं, ड्रीम गर्ल क्यों लेट?
वेट वेट कर कम हुआ, क्या उसको नॉलेज?
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रँगरेजन आ रंग ला, लगा रही चितचोर।
वाट्स एप इंस्टा करें, लुक-छिपकर कवरेज।।
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आई लड़ी झुक उठ मिली, आई चुराए हार्ट।
आई आई तो आई कह, आई सजाए सेज।।
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होली होली हो गई, होती होगी मान।
सुमिर लोनली बैठकर, सलिल मालगुडी डेज।।
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© आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’
४.३.२०२६
संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,
चलभाष: ९४२५१८३२४४ ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈



