स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’
(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी द्वारा रचित – “कविता – गाँव तरसते शहर को, शहर चाहते गाँव…” । हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।)
☆ काव्य धारा # २६२ ☆
☆ गाँव तरसते शहर को, शहर चाहते गाँव… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆
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सादी संस्कृति गाँव की एक सरल संसार
बिना दिखावे के जहाँ दिखता हर परिवार ।
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लोगों में सच्चाई है आपस में है प्यार
परम्पराओं से पगा संबंध हर व्यवहार।
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छोटी अटपट बात में हो चाहे तकरार
पर घर का हर व्यक्ति हर घर का रिश्तेदार ।
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सबको है सबकी फिकर सब हैं एक समान
परख-पूँछ है, नेह है, भले न हो पहचान।
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बड़े सबेरे जागते, सोते होते रात
शाम समय चौपाल में मिलते करते बात ।
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हर एक के है झोपड़ी, आँगन, बाड़ी, खेत
जिनमें कटती जिंदगी, पशु-हल – फसल समेत ।
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शहर गाँव से भिन्न हैं. रीति-नीति विपरीत
यहाँ कोई अपना नहीं, नहीं किसी से प्रीति ।
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शहरों में फुरसत किसे ? हरेक हर समय व्यस्त
घर के द्वारे बन्द नित, सब अपने में मस्त ।
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लोगों की आजीविका सर्विस या व्यापार
पड़ोसियों की खबर हित पढ़ते हैं अखबार ।
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बिन आँगन के घर बने, चढ़े एक पै एक
मंजिल छूते गगन को पातें खड़ी अनेक ।
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भीड़-भाड़ भारी सदा बड़े बड़े बाजार
आने जाने के लिये, हों गाड़ी या कार ।
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औपचारिक व्यवहार सब शब्दों का संसार
मन में धन की चाह है केवल धन से प्यार ।
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गाँव तरसते शहर को, शहर चाहते गाँव
चमक दमक तो बहुत है, शांति न सुख की छाँव ॥
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© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’
साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी भोपाल ४६२०२३
मो. 9425484452
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





