स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है, आपके काव्य संग्रह ‘उजास ही उजास’ की एक भावप्रवण कविता – शब्द नहीं रहे शब्द।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २७९ – अब तो जागो…२ ✍

(काव्य संग्रह‘उजास ही उजास’ से )

ऋतुओं का रहस्य भी उसने ही बताया था।

हमसे बार बार होती थी भूल

और वह

हमें समझाता था

मनुष्य

के मन का भूगोल।

और इतिहास ?

हाँ, उसने कहा था-

इतिहास की बेवकूफियों से बचो

अपना इतिहास खुद रचो।

उसकी याद करते-करते

मन दहने लगा

उसका कहा सुना

आँसुओं की नदी संग बहने लगा।

और तभी

एक शिशु स्पर्श ने चेताया

हाँ,

वह घुटनों के बल आया

और बैठ गया आगे।

हमने उसकी नि:शब्द वाणी सुनी-

वह कह रहा था

अभागो!

जागो।

© डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments