श्री एस के कपूर “श्री हंस”
☆ “श्री हंस” साहित्य # २०० ☆
☆ गीत ।। मैं एक कलम का सिपाही हूँ ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆
।।विधा।।पद्य(छंद मुक्त)तुकांत।।
☆
=1=
मैं राजनीति का मंच हूँ।
मैं लिये व्यंग का तंज हूँ।
मैं विरोधी पर पंच हूँ।।
मैं एक कलम का सिपाही हूँ।।
=2=
मैं भूख का निवाला हूँ।
मैं मंदिर और शिवाला हूँ।
मैं देश का रखवाला हूँ।।
मैं एक कलम का सिपाही हूँ।।
=3=
मैं सबकी सुनता कहता हूँ।
नहीं अपने में ही रहता हूँ।
शीतल जल सा बहता हूँ।।
मैं एक कलम का सिपाही हूँ।।
=4=
मैं एक शिकारी भी हूँ।
मैं खुद शिकार भी हूँ।
पर रहता खबरदार भी हूँ।।
मैं एक कलम का सिपाही हूँ।।
=5=
मैं रखता हर खबर हूँ।
मैं करता खबरदार भी हूँ।
मानो तो मैं अखबार ही हूँ।।
मैं एक कलम का सिपाही हूँ।।
=6=
मुझ से तेज़ धीमा नहीं है।
मेरे सा कोई नगीना नही है।
मेरी तो कोई सीमा नहीं है।।
मैं एक कलम का सिपाही हूँ।।
=7=
मैं बच्चों का उत्पात हूँ।
मैं बड़ों का वादविवाद हूँ।
मैं बुजर्गों का आशीर्वाद हूँ।।
मैं एक कलम का सिपाही हूँ।।
=8=
मैं ऊपर ऊंचा नभ सा हूँ।
मैं कठोर जैसे थल सा हूँ।
मैं कलकल बहता जल सा हूँ।।
मैं एक कलम का सिपाही हूँ।।
=9=
में जीवन का मर्म हूँ।
मैं सख्त और नर्म हूँ।
मैं धर्म और कर्म हूँ ।।
मैं एक कलम का सिपाही हूँ।।
=10=
मैं गरीब की हाय हूँ।
नहीं मैं असहाय हूँ।
मैं सर्वपंथ सुखाय हूँ।।
=11=
मैं एक कलम का सिपाही हूँ।।
मैं समाज का दर्पण हूँ।
मैं ईश चरणों में अर्पण हूँ।
मैं सूचनाओं को समर्पण हूँ।।
मैं एक कलम का सिपाही हूँ।।
=12=
मैं मन का स्पंदन हूँ।
मैं राष्ट्र का वंदन हूँ।
मैं सच का अभिनंदन हूँ।।
मैं एक कलम का सिपाही हूँ।।
=13=
मैं लिए हर शब्द भी हूँ।
मैं निःशब्द भी हूँ।
मैं सदैव उपलब्ध भी हूँ।।
=14=
मैं एक कलम का सिपाही हूँ।।
भूत,भविष्य,वर्तमान बात बतलाता हूँ।
लोगो को सचेत कर के भी जागता हूँ।
कलमआईने से हकीकत दिखलाता हूँ।।
मैं एक कलम का सिपाही हूँ।।
=15=
मेरी दुर्गम सी डगर है।
मुझमे भी अगर मगर है।
मेरी वाणी अजर अमर है।।
मैं एक कलम का सिपाही हूँ।।
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© एस के कपूर “श्री हंस”
बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब – 9897071046, 8218685464






