डॉ कुन्दन सिंह परिहार

(आपसे यह  साझा करते हुए हमें अत्यंत प्रसन्नता है कि  वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे  आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं। आज  प्रस्तुत है  एक अतिसुन्दर व्यंग्य  ‘सब मर्ज़ों की एक दवा’।  यह जीवन का सत्य है कि सब मर्ज़ों की एक ही दवा  है और यह एक गरीबदास है जो मानने को तैयार ही नहीं है।  इस अतिसुन्दर व्यंग्य  के लिए डॉ परिहार जी की  लेखनी को  सादर नमन।)

गुरु पूर्णिमा पर्व पर परम आदरणीय डॉ कुंदन सिंह परिहार जी को सादर चरण स्पर्श।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 57 ☆

☆ व्यंग्य – सब मर्ज़ों की एक दवा

 

भाई जी, यह बहुत अच्छा हुआ कि संसार के सब मर्ज़ों की एक दवा मिल गयी। अब इस बात में कोई शक नहीं रहा कि ज़िन्दगी की सब व्याधियों की एक दवा पैसा है, अक्सीर दवा।

पैसा है तो रोग-दोष आपके पास नहीं फटकते। पैसा है तो आपके लिए सब कुछ मुहैया है। बोलो,क्या ख़रीदना चाहोगे? मोटर ख़रीदोगे या हवाई जहाज़? फाइल ख़रीदोगे या बाबू? अफसर ख़रीदोगे या विधायक?

पैसा पास है तो कला, सभ्यता, संस्कृति भी मिल सकती है। यहाँ तो हर चीज़ बिकती है, कहो जी तुम क्या क्या ख़रीदोगे? आप बस ज़ुबान भर हिलाओ बबुआ, संसार की सब विभूतियाँ आपके चरणों में लोटेंगीं। हाँ, बस थोड़ा नावाँ दिखाते जाओ।

पैसा है तो सुपुत्रों को पढ़ने के लिए जर्मनी जापान भेजो और फिर आसानी से अच्छी नौकरी या व्यापार में जमा दो। नौकरी की आपाधापी और हताशा सिर्फ अभागों के लिए है। पैसा है तो ज़ुकाम का इलाज जसलोक में कराओ। या अगर घर के डॉक्टर पसन्द न हों तो अमेरिका चले जाओ। कोई असाध्य रोग पकड़ ले तो पैसा आपको बचा भले ही न पाए, पर चार छः साल आपकी ज़िन्दगी को खींच तो सकता ही है। जिस दिन विज्ञान मृत्यु पर विजय पा लेगा उस दिन सब पैसे वाले अमर हो जाएंगे, क्योंकि अमरत्व के मंहगे उपकरण ख़रीदने की शक्ति उन्हीं में होगी। तब वे देवताओं की श्रेणी में आ जाएंगे और आदमी के नाम पर वही बचेंगे जिनकी जेब में नावाँ नहीं होगा।

पैसा पास है तो आदमी को कोई पाप, दोष नहीं छूते। हज़ार पाप करके भी वह पवित्र, निर्मल रह सकता है।  ‘विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा। ‘ गोस्वामी जी भी कह गये हैं, ‘समरथ को नहिं दोष गुसाईं। ‘

लेकिन यह गरीबदास बड़ी देर से मेरी बगल में भुनभुनाकर कुछ कह रहा है। पूछता है, इस पैसे वाली दुनिया में उसका क्या होगा? तो सुनो गरीबदास, तुम्हारी जो हालत है वह तुम्हारा प्रारब्ध और पूर्व जन्म के कर्मों का फल है। लेकिन गरीबदास मानता नहीं। कहता है बड़े लोग कह गये हैं ‘बड़े भाग मानुस तन पावा’।  मनुष्य का जन्म बड़े पुण्यों के बाद मिलता है, तब ये पुराने पाप कहाँ से आ गये? है न सिरफिरा?

लो गरीबदास, तुम्हारे हित के लिए कुछ सूक्तियाँ देता हूँ। इन्हें जतन से गठिया लो। ये तुम्हारी तकलीफ को दूर भले ही न करें, लेकिन तुम्हारा ध्यान उस पर से हटा देंगीं। सुनो—‘हानि लाभ ,जीवन मरण,यश अपयश विधि हाथ’, ‘को करि तरक बढ़ावै साखा, हुईहै वहि जो राम रचि राखा’, ‘संतोषी सदा सुखी’, ‘देख पराई चूपड़ी मत ललचावै जीव, रूखा सूखा खाय के ठंडा पानी पीव’, ‘जो आवै संतोष धन, सब धन धूरि समान। ‘ इसलिए अपनी ज़िन्दगी धूरि समान, बच्चों की पढ़ाई लिखाई और नौकरी धूरि समान,अपने बुढ़ापे और बीमारी का इंतज़ाम भी धूरि समान।

एक और सूक्ति देता हूँ गरीबदास। इसे कई समझदार लोग दुहराते हैं—-‘पाँचों उँगलियाँ बराबर नहीं होतीं। ‘ समझे गरीबदास? लेकिन गरीबदास मूड़ हिलाता है, कहता है, ‘पाँचों उँगलियाँ बराबर भले ही न हों, लेकिन ऐसा तो नहीं होता कि बड़ी उँगली हमेशा गुलाब पर रखी रहे और छोटी हमेशा काँटों में घुसी रहे। ‘ गरीबदास  का कहना है कि यह गोरखधंधा उसकी समझ में नहीं आता। सच्ची बात तो यह है गरीबदास, कि यह सब मेरी समझ में भी नहीं आता।

 

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

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Shyam Khaparde
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अच्छा व्यंग बधाई