श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “तरही ग़ज़ल“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १४१ ☆

✍ तरही ग़ज़ल… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

ठसक दिखती अबध के आज भी इसमें नवाबों की

झलक मिलती नहीं है आदमी में एहतिसाबों की

लरजते होंठ नम आँखें ये बिखरे ठूठ सिगरिट के

बयाँ करते है मेरी दास्ताँ बस इज़्तिराबों की

 *

ये पूजीवाद के हामी समझ लें वक़्त की आहट

उठी है आधियाँ चारों तरफ से इंक़लाबों की

 *

ग़मों के शहर में रहकर समझ में आ गया मुझको

किताबे ज़ीस्त में कितनी कमी खुशियों के बाबों की

 *

ज़ुबाँ ख़ामोश है आँखों में है मंज़र तबाही का

मुसल्लत हैं मेरे दिल पर अभी घड़ियाँ अजाबों की

 *

कभी ज़ुल्मो सितम की टूटना तय है सिलासिल का

सदा कब तक दबाई जाएगी आखिर इताबों की

 *

मुआफ़िक ढाल कर हर हाल में है जानती चलना

बड़ी दुश्वार होती ज़िंदगी यारो सराबों की

 *

सजाए जिसके आँखों में  किया तन्हा वही मुझको

उठाये फिर रहा हूँ लाश मैं अपने ही ख़्वाबों की

*

उदासी साथ मेरे ओढ़ कर शामो-सहर बैठे

नहीं अब रास आती सुर्ख कलियाँ भी गुलाबों की

 *

न जाने गुल मेरे किस हाल में होगें जो रख भेजे

अरुण को फ़िक़्र बिलकुल भी नहीं है उन किताबों की

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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