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(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

☆ जहाँ गिरता है पसीना, वहाँ चाँद उगता ही है ! – मुकुटबिहारी “सरोज” ☆

म प्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन, भोपाल एवं छिंदवाड़ा ईकाई के संयुक्त तत्वावधान में जनकवि मुकुटबिहारी सरोज की जन्मशती आयोजित

सतपुड़ा की उपत्यका में फैले नीलाभ अंधेरे, महुआ, आम, नीम, बाँस और पलाश के दहकते फूलों की सुंदरता तथा उष्मा से अनुप्राणित अगर कोई कार्यक्रम हो, वह भी काव्यांजलि का तो उसके मोहक स्वरूप की कल्पना सहजतः की जा सकती है।

मध्य प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन भोपाल एवं छिंदवाड़ा ईकाई के संयुक्त तत्वावधान में जनकवि मुकुटबिहारी सरोज की जन्मशती का भव्य कार्यक्रम आयोजित किया गया।

सुख्यात बुन्देलखण्डी कवि महेश कटारे सुगम की अध्यक्षता में संपन्न इस सारस्वत आयोजन का शुभारंभ मानवीय समाज रचना के संकल्प से हुआ। प्रथम वक्ता हेमेन्द्र राय ने सरोज जी की पंक्ति से आह्वान किया—“इन हवाओं पर कभी विश्वास कर लेना न तुम”

“तब तलक मत लिख, जब तलक आँख पानी से न भर जाए”–कवि की इन पंक्तियों के साथ प्रसिद्ध गीतकार कवयित्री डाॅ मालिनी गौतम ने कहा–समय की धड़कनों को गहराई से सुनती हैं उनकी रचनाएं। जागरण के आग्रह की कविता है उनकी।

सरोज जी का काव्यपाठ का अनूठा अंदाज़ श्रोताओं को बाँधे रखता था। पिता श्री से जुड़े संस्मरणों को श्रोताओं से साझा करते हुये पुत्री मान्यता सरोज ने कहा कि उन्होंने आपातकाल का विरोध किया तो डी डी और रेडियों से ब्लैकलिस्ट कर दिये गए।

वे जैसा जीते थे वैसा लिखते थे। वे एक डेमोक्रेटिक पिता थे। अपने बच्चों पर पिता होने का भार नहीं ढोया।

डॉ मनीषा जैन ने उनके दो काव्य-संग्रह किनारे के पेड़ और पानी के बीज के हवाले से उनके विद्रोही व्यक्तित्व को रेखांकित किया–“जहां गिरता है पसीना। वहाँ चाँद उगता ही है। “सरोज की कविता जीवन का आसव है। “जिसमें मानव मन की पीड़ा है, आक्रोश है और कश्मकश है।

प्रो लक्ष्मीकांत ने उन्हें पूर्ण कवि निरूपित किया। उन्होंने कम लिखा पर पूरी ईमानदारी से जनमन तक पहुँच जाए ऐसी भाषा में लिखा। “जिसने सहा नहीं उसने कहा नहीं। “उनके कृतित्व पर विभिन्न विश्वविद्यालयों में शोध हो रहे हैं।

अध्यक्ष महेश कटारे सुगम की दृष्टि में वे किसान कवि थे। सर्वथा एवं सर्वदा अनुकरणीय।

मुख्य अतिथि इन्दिरा किसलय ने कहा कि समय के विशाल अंतराल के बावजूद उनकी कविताएं उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी कभी थीं। जिनमें दहक और महक दोनों हैं। यही उनके सृजन को कालजयी बनाती है। उनमें संघर्ष का शंखनाद तो है पर आशावाद भी उतना ही प्रबल है। व्यवस्थागत दिद्रूपताओं ने उनकी कविता को उर्वरक प्रदान किया– ” सृजन कभी मंजूर नहीं करता पहरे तलवार के”। “वे निष्कपट अभिव्यक्ति के बादशाह हैं। “

इस अवसर पर “यादों में सरोज” इस जन्मशती विशेषांक का लोकार्पण भी किया गया।

द्वितीय सत्र में सर्व श्री महेश कटारे सुगम, इन्दिरा किसलय, मालिनी गौतम, अभिषेक वर्मा, लक्ष्मणप्रसाद डेहरिया, ओमप्रकाश नयन, हेमेंद्र राय, विनयप्रकाश जैन, अंजुमन आरजू, श्रृति कुशवाहा, महेश दुबे, प्रभात कटारे, अवधेश तिवारी, आशीष मोहन, तथा राकेश राज ने बेहतरीन कविताएं प्रस्तुत कीं। नन्ही बच्ची आन्या ठाकुर ने सरोज जी की कविताओं की धारासार प्रस्तुति दी।

चित्रकार कवि रोहित रूसिया ने सरोज जी के गीतों का सस्वर सरस पाठ किया। कार्यक्रम का प्रारंभ ही ओशिन धारे की सांगीतिक प्रस्तुति से हुआ जिसने वातावरण को सुरों की बारिश में भिगो दिया।

चित्रकार ध्रुव के, सरोज के काव्यांशों पर आधारित पोस्टरों की धूम रही।

सचिव शेफाली शर्मा का सधा हुआ सहज संचालन मंत्रमुग्ध कर गया।

बीना, भोपाल, छिंदवाड़ा आदि स्थानों से पधारे कवियों ने भावपूर्ण कविताएं पेश कीं।

प्रबुद्ध गंभीर एवं जिन्दादिल साहित्यजीवी मान्यवरों की उपस्थिति ने कार्यक्रम को ऊँचाई एवं अपूर्व गरिमा प्रदान की। सर्व श्री– गोवर्द्धन यादव, पवन शर्मा, रणजीतसिंह परिहार, डाॅ उर्मिला खरपुसे, डॉ अमर सिंह, अशोक जैन, शैलेन्द्र तिवारी, मोहिता जगदेव, हेमंत झा, राजकुमार चौहान, पद्मा जैन, दीप विश्वकर्मा, शरद मिश्रा, अंकुर वाल्मीकि, रामलाल सराठे, रश्मि, राजेन्द्र यादव, अनुराग श्रीवास्तव, अभिनव श्रीवास्तव, संजय औरंगाबादकर आदि प्रबुद्ध जनों की उपस्थिति ने आयोजन को प्रकाम्य ऊँचाई प्रदान की।

“मध्य प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन” के अध्यक्ष एवं देशबंधु पत्र समूह के संपादक आदरणीय “पलाश सुरजन सर” इस महनीय आयोजन के श्रेयार्थी रहे।

दिनेश भट्ट के आभार प्रदर्शन के साथ कार्यक्रम समाप्त हुआ।

 साभार – सुश्री इंदिरा किसलय 

≈ श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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