डॉ. मीना श्रीवास्तव
☆ कथा-कहानी ☆
☆ बस इतना सा ख्वाब है ! – भाग – २ – मूल मराठी कहानीकार – सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे ☆ हिन्दी भावानुवाद – डॉ. मीना श्रीवास्तव ☆
सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे
उसके मन को बस एक ही सवाल निरंतर कुरेदता रहता … पति की सात-आठ हजार रुपये की तनख्वाह में मनमाफिक जीवन कैसे जिया जाए? यथा काल घर में नए मेहमान आने का अंदेशा होने लगा। दोनों की खुशी का ठिकाना न रहा। पति यथाशक्ति उसको लाड प्यार से जतन कर उसकी मांगें पूरी करने में लगा रहता। प्रतीक्षा की घड़ियाँ समाप्त हुई और एक शुभ दिन उनके जीवन में नन्ही परी ने कदम रखा। उसके आगमन के साथ ही उन दोनों के जीवन में एक नया मोड़ आया। उसके कार्यकलाप काफी हद तक बढ़ गए और साथ साथ खर्चे भी! लेकिन वह बदलते हालात के साथ पूरी तरह से जी जान लगा कर तालमेल बिठाने में लगी रही। चॉल में हमउम्र सहेलियों के साथ गपशप के दौरान विचारों और समस्याओं का आदान-प्रदान करते हुए, अनायास ही उसने एक गांठ मन में बांध ली कि, अपने सवालों के जवाब खुद को ही खोजने होते हैं। ऐसे में पहली बिटिया सवा साल की होते-होते फिर एक बार नया कोंपल फूटा। उसने सही समय पर दूसरे बच्चे को जन्म दिया और इस बार भी बेटी ही हुई। एक पल के लिए, अनजाने में ही उसके मन में हूक उठी कि काश इस बार बेटा होता तो कितना ही अच्छा होता! यह तो उस क्षण का आवेग था, परन्तु बेटा हो या बेटी… वात्सल्य भाव से भरपूर दूध की धारा माँ के अंचल से अपने आप ही झरने लगती है… और फिर इसी से समानांतर खर्चे का भी झरना तेजी से बहने लगा। अब तो ‘आमदनी अठन्नी खर्चा रुपैय्या’ जैसी हालत होने लगी।
एक दिन, उसके पति ने नौकरी का विज्ञापन पढ़ा और अपने दिल पर पत्थर रखकर अकस्मात ही उसे सुझाव दिया कि यह नौकरी उसके लिए ठीक रहेगी। नौकरी के लिए एकमात्र शैक्षणिक योग्यता बारहवीं पास होना था। वह आयु सीमा भी पूरी कर रही थी। बस बाधा उत्पन्न करने वाली एकमात्र शर्त यह थी कि, उसे नगर निगम के मुख्य कार्यालय जाना पड़ेगा। अब तक वह मुंबई के जीवन से अच्छी तरह से परिचित हो चुकी थी। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह था कि क्या वह अकेली बस से यात्रा कर पाएगी? लोकल ट्रेन का सफर तो दूर की बात थी। इस घडी तक तो घर की चारदीवारी में ही उसका विश्व समाया था । घर-आंगन के परे भी जग होता है, इस वास्तविकता को मानों वह भूल चुकी थी। लेकिन घर में आमदनी बढ़ाना अत्यावश्यक था। माता-पिता की दवाइयों और लड़कियों की स्कूल का खर्चा आए दिन बढ़ता ही जा रहा था। और पति के दोनों हाथ कमजोर पड़ने लगे थे। इस परिस्थिति में मजबूरन पति बहुत अनिच्छा से ही सही, उसे नौकरी के लिए आवेदन करने का आग्रह करने लगा। वह भी घर दर्दनाक हालत समझ पा रही थी, साथ ही पैसे की बढ़ती आवश्यकता उससे छिपी नहीं थी। एक ओर, खुद पैसे कमाने का विचार लुभावना प्रतीत हो रहा था, लेकिन दूसरी ओर उसके मन पर भय का गहरा साया छाया था। हर दिन उसे इतनी लंबी दूरी की यात्रा अकेले तय करनी होगी, उस प्रचंड भीड़भाड़ में अकेले मजबूती से डटे रहना, दिन भर अजनबी इन्सानों के बीच आना-जाना… और तिस पर काम? उसने तो महीनों से कलम छुई तक नहीं थी… वह जटिल सरकारी कार्य… क्या वह समझ पाएगी? क्या वह उसे सक्षमता से निभा पायेगी?… और उसकी छोटी बेटियां, सास-ससुर का क्या होगा? उनकी देखभाल कौन करेगा?… ऐसे अनगिनत सवाल उसके दिमाग को घेरे हुए थे, जिनके उत्तर ढूंढते हुए वह और भी भयकंपित होने लगी । “अरी भागवान! आवेदन करने में हर्ज क्या है? तुरन्त नौकरी मिलेगी इसकी कोई गुंजाईश तो है नहीं।”…उसके पति ने इन आश्वासक शब्दों से उसे मना ही लिया… उसने आवेदन किया। उसे साक्षात्कार के लिए बुलाया गया… उसने अत्यधिक घबराहट की स्थिति में किसी तरह साक्षात्कार भी दिया… और आश्चर्यजनक रूप से, उसे एक महीने के भीतर नियुक्ति पत्र तक मिल गया…अब उसकी वास्तविक सत्वपरीक्षा का प्रारम्भ हुआ।
चॉल में ही रहने वाली एक चाची मामूली पैसे के ऐवज में बच्चियों की देखभाल करने के लिए राजी हो गई। लेकिन उसे नौकरी मिल जाने के बावजूद गृहकार्यों के लिए किसी नौकरानी को पालना नामुमकिन था, क्योंकि नौकरी ‘लोअर डिविजन क्लर्क’ की थी… और वेतन भी उसके पदानुसार ही सीमित था। एक राहत की बात थी कि, एक नौकरानी सास-ससुर को दोपहर के नियत समय पर खाना देने के लिए तैयार हो गई। उस नौकरानी का वेतन एक अनिवार्य खर्च ही था। धीरे-धीरे एक के बाद एक सारे परिवारजनों की रोजमर्रा जिंदगी सुस्थिति में आ गई। इन खर्चों को घटाने के पश्चात भी उसके पास कम से कम चार-पाँच हज़ार रुपये बचेंगे, ऐसा उसका अनुमान था। अब सबसे कठिन कार्य बचा था अपने अस्थिर मन को आत्मविश्वास के अश्व पर आरूढ़ करवाना।
अपने पति के विश्वास का हाथ मजबूती से थामे हुए, उसने यह व्यवधान भी दूर किया और उसकी नौकरी शुरू हो गई… और जीवन की रेलगाड़ी वक्त की पटरियों पर बेतहाशा भागने लगी। यादों के झुरमुट की हरियाली भी उसी द्रुतगति से पीछे हटती गई… एक-एक करके, वे इतने पीछे हो गई कि नजर की ओट से भी अदृश्य हो गई…ठीक वैसे ही, जैसे लोकल ट्रेन की खिड़की से ओझल होती रहती थी। … जब उसने पहली बार मुंबई में कदम रखा, तो वह अपने साथ सपनों की बड़ी सी गठरी भी साथ संजो कर लाई थी। उस गठरी में बंद सपने अपेक्षाकृत छोटे-छोटे ही थे! …वह चाहती थी, ‘राणीचा बाग’ (रानी का बगीचा) जी भरकर घूमूं, … कमला नेहरू पार्क में बने ‘बूट हाऊस’ अर्थात बूढ़ी औरत के जूते में जाते हुए मरीन ड्राईव्ह का मनोरम नजारा देखूँ, … उसने सुना था, जहाँ देखो वहीं सड़कों के किनारे बाजार सजते हैं रोज, अलीबाबा की गुफा जैसी तरह-तरह की चीज़ों से भरे रहते हैं…… उसने सोचा था, जहाँ तहाँ इतराते हुए चक्कर काटूंगी और मनचाही छोटी-मोटी चीज़ें खरीद लूँगी…उसे नमक की खदानें (मीठागर) देखने की बहुत उत्सुकता थी…इसके अलावा, वह देखना चाहती थी कि डबल-डेकर बस वास्तव में कैसी होती है… उसमें सवारी करने की चाह भी थी मन में… और उसका सबसे बड़ा सपना था मुंबई के समुन्दर का दर्शन करने का… मुंबई में भी समुन्दर है, यह जानने के तुरन्त बाद तो नीलवर्णी मनोरम सागर से गर्भनाल के अटूट बंधन द्वारा जुड़े सुहाने रिश्ते को वह किसी भी हालत में टूटने नहीं देना चाहती थी। लेकिन जैसे ही उसका जीवन उस चॉल में सिमटी छोटी-सी दुनिया में उलझ गया, वैसे ही ये नन्हे कोंपल से खिले सपने भी उसके मन की गठरी में उलझ गए… बंद होने से उनका दम घुटने लगा … और फिर धीरे-धीरे विस्मृति के काले धुंए में लुप्त हो गए।
शीघ्रगामी कालचक्र रुकने का नाम तक नहीं ले रहा था। बेटियाँ बड़ी हो गईं। वह हर हाल में उन्हें स्नातक होने तक तक पढ़ाना चाहती थी, और इस आकांक्षा को पूरा करने हेतु वह खुद के मामले में बेहद कृपणता दिखाकर पाई पाई जोड़ रही थी। उसने और उसके पति ने केवल बारहवीं कक्षा तक ही शिक्षा पाई थी। इस कारण स्टोर कीपर और एलडीसी (निम्न श्रेणी लिपिक) इन दोनों ही पदों के चलते पदोन्नति का कोई सवाल ही नहीं था… लोकल ट्रेन एवं और कार्यालय की चिट फंड योजना में नियमित रूप से भाग लेने से, और वेतन में वृद्धि होने पर भी, उस वृद्धि को छुए बिना उसने कुछ रकम और थोड़ा बहुत सोना इकठ्ठा कर रखा था। एक के बाद एक पैदा हुई दोनों बेटियों का विवाह भी थोड़े ही अंतराल में करना था। इसलिए बहुत समय पहले, उसने अपने माता-पिता द्वारा उसकी शादी में पहनाई गईं चार चूड़ियाँ और एक छोटा गले का हार बिना ज्यादा उपयोग में लाते हुए इसी समय के लिए संजो कर रखे थे। दोनों ही लड़कियों के नाक नक्श सुन्दर थे। परिस्थितिनुसार वे समझदार और सुशील थीं। उनकी स्नातक परीक्षा समाप्त होते ही, उन दोनों के लिए खातेपीते परिवारों से रिश्ते के प्रस्ताव आने लगे। उसका बड़ा ही सीधा और सटीक सा विचार था कि जब उसकी अपनी झोली खाली है, तो दूसरे की खाली झोली के बारे में शिकायत कैसी? भाग्यवश दोनों ही होने वाले दामाद भी शालीन, व्यसन-मुक्त और शिष्ट थे। उन पर ज्यादा जिम्मेदारियां भी नहीं थीं। वेतन भी संतोषजनक थे। भला उसके पास इससे अधिक सोचविचार करने का वक्त कहां था? एक वर्ष के अंतराल से दोनों बेटियां ससुराल चलीं गईं। लेकिन घर में पैसों की तंगी की कहानी तो चल ही रही थी। बेटियों की शादी के लिए पति-पत्नी को कुछ कर्ज लेना पड़ा। फिर लड़कियों पर होने वाले खर्चों की जगह ऋण की किश्तें चुकानी शुरू हो गईं; बस यही एक अंतर था। वक्त के प्रवाह में वृद्धावस्था की सीमा लाँघ चुके उसके ससुर एवं फिर थोड़े अंतराल के भीतर उसकी सास, दोनों ही चल बसे। इतनी तसल्ली थी कि इन दुखद घटनाओं के पहले उसे, उसके पति और दोनों विवाहित बेटियों को उनके भरपूर आशीष प्राप्त हुए।
… इतने वर्षों तक लगातार भागदौड़ करने के बाद न केवल उसका शरीर बल्कि, उसका मन भी अत्यधिक क्लांत हो चला था… लेकिन अब वह बहुत ही तटस्थ, शांत और बेहद मजबूत हो गया था। इतने वर्षों की अथक मेहनत के बाद उसने जिन जिम्मेदारियों का बोझ उठाया था, वह वाकई थोड़ा कम हो गया था, परन्तु इस हालात में तुरन्त नौकरी छोड़ने के बारे में सोचना बिलकुल असंभव लगता था। पति की नौकरी एकाध साल में खत्म होने वाली थी, लेकिन उसकी नौकरी के फ़िलहाल ४-५ वर्ष बाकी थे। पति की निजी नौकरी में पेंशन की कोई गुंजाईश ही नहीं थी। यदि निवृत्ति के वक्त पति को फंड की थोड़ी बहुत धनराशि भी मिलती, तो उसे दोनों की वृद्धावस्था के खर्चों में ही लगाना पड़ता। इसके अलावा, यदि वह सेवानिवृत्ति की आयु से पहले ही नौकरी छोड़ देती, तो उसकी निवृत्ति- निधि अर्थात पेंशन की राशि कम हो जाती। इसलिए अभी नौकरी छोड़ने का प्रश्न ही नहीं उठता था। चाहे वह कितनी भी थकी-हारी हो, चाहे उसका प्रकृति स्वास्थ्य बिगड़ने लगा हो, वह बीच में नौकरी से छुटकारा पाने के बारे में सोच भी नहीं सकती थी। आजकल उसके पैर शिथिल हो गए थे सो तेज़ी से नहीं उठ पा रहे थे… उन्हें जोर जबरदस्ती से घसीटना पड़ता था। लेकिन इन सब मुसीबतों को झेलते हुए, उसको सुबह नौ सात (९.०७ ) वाली लोकल ट्रेन पकड़ना आज की तारीख में भी परम आवश्यक था…
… लेकिन हाल ही में, कोल्हू के बैल जैसी अनवरत पिसती जिंदगी के बीच एक नवीनतम सपना उसे पुकार रहा था…. पहले वाले सपनों जैसा ही, बहुत छोटा सा…. सेवानिवृत्ति से पहले कम से कम एक महीने के लिए उस ९. ०७ की लोकल ट्रेन का फर्स्ट क्लास पास खरीदना, और महीन साड़ियों और पोशाकों से सजी, इत्र की खुशबू महकाती खुशहाल स्त्रियों के धक्के खाते ही सही, इत्मीनान से ऑफिस पहुंचना, और इसके बाद ही निवृत्त होना…. बस इतना ही… यह तो कुंवारी कली सा अछूता सपना था…. वैसे, सच में देखा जाए तो यह अंतिम ही समझना होगा… परन्तु कम से कम यह तो पूरा होगा न? –
…. वह फिर एक बार शांतिपूर्वक उस भीड़ का एक बेनाम हिस्सा बनकर उसमें घुल जाती!…
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मूल मराठी कहानीकार – सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे
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हिंदी भावानुवाद – डॉ. मीना श्रीवास्तव
संपर्क – ठाणे (पश्चिम), (महाराष्ट्र) भ्रमणध्वनि-९९२०१ ६७२११ ई मेल- drmeenashrivastava21@gmail.com
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈







