सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे
☆ “उस रोज़ ‘दिवाली’ होती है” – स्व. अटल बिहारी बाजपेयी ☆ संकलनकर्ता – सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे ☆
(स्व. अटल बिहारी बाजपेयी जी की कविता “उस रोज़ ‘दिवाली’ होती है” के मराठी भावानुवाद के लिए आप निम्न लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं.)
👉 ☆ “त्यादिवशी खरी दिवाळी असते…” ☆ मराठी भावानुवाद – सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे ☆
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जब मन में हो मौज बहारों की
चमकाएँ चमक सितारों की,
जब ख़ुशियों के शुभ घेरे हों
तन्हाई में भी मेले हों,
आनंद की आभा होती है
उस रोज़ ‘दिवाली’ होती है ।
*
जब प्रेम के दीपक जलते हों
सपने जब सच में बदलते हों,
मन में हो मधुरता भावों की
जब लहके फ़सलें चावों की,
उत्साह की आभा होती है
उस रोज़ दिवाली होती है ।
*
जब प्रेम से मीत बुलाते हों
दुश्मन भी गले लगाते हों,
जब कहींं किसी से वैर न हो
सब अपने हों, कोई ग़ैर न हो,
अपनत्व की आभा होती है
उस रोज़ दिवाली होती है ।
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जब तन-मन-जीवन सज जाएं
सद्-भाव के बाजे बज जाएं,
महकाए ख़ुशबू ख़ुशियों की
मुस्काएं चंदनिया सुधियों की,
तृप्ति की आभा होती है
उस रोज़ ‘दिवाली’ होती है ।
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— स्व अटल बिहारी वाजपेयी
मराठी भावानुवाद – सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे
संपादिका – ई-अभिव्यक्ति (मराठी)
सांगली, महाराष्ट्र
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






