सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ पुस्तक चर्चा ☆ “हार्ट लैंप “– से निकली रोशनी की पड़ताल ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

नारी अस्मिता और उससे जुड़ी जमीनी हकीकत ,उत्पीड़न,टूटती खामोशियों और धधकते विद्रोह को कथा कहानियों का उपजीव्य बनाया जाता रहा है। पर कोई आवश्यक नहीं कि हर साहित्यकार की दृष्टि की गहराई और समझ का क्षेत्रफल एक जैसा हो। साहित्य एक शाश्वत प्रवाह है।हर लेखक पाठकों को कुछ नया और ताजा दे जाता है।

इस दिशा में  सन 2025 की बुकर पुरस्कार विजेता “बानू मुश्ताक” की  12 कहानियों के संकलन  “हार्ट लैंप” का उल्लेख जरूरी है।जिसका अंग्रेजी अनुवाद “दीपा भारती” ने किया है।यह संकलन उनके समग्र कथा संग्रह ” हसीना” से चयनित कहानियों का है।यूँ तो बानू– काव्य, कहानी ,उपन्यास, और निबंध को लेकर 9 कृतियों की प्रणेता हैं पर हार्ट लैंप में कुछ तो ऐसा है जो विश्व मानस को झकझोर रहा है। निर्णायक समिति के मैक्सपोर्टर के शब्द इसे भली भाँति अभिव्यक्ति दे सकते हैं— “यह अंग्रेजी के पाठकों के लिये कुछ नया और अनूठा है। यह एक क्रान्तिकारी अनुवाद है जो भाषा में खलबली मचा देता है। अंग्रेजी भाषा में एक नयी बुनावट पैदा करता है।”

बानू ने निजी जिन्दगी में, शादी के बाद कितनी ही तकलीफों का सामना किया है। कन्नड़ माध्यम से शिक्षा ग्रहण करनेवाली बानू लेखिका होने से पूर्व पत्रकार, वकील और सामाजिक न्याय की अवधारणा को बल देने वाले “बांदाया आन्दोलन” की प्रवर्तक रहीं। ये सारे पक्ष पितृसत्तात्मक समाज की संरचना को समझने में मददगार रहे। दक्षिण भारत की मुस्लिम महिलाओं के जीवन की त्रासदी को उन्होंने वाणी दी है। न्याय के इस विचार के साथ उन्हें पर्याप्त विरोध सहना पड़ा और धमकियों से भी दो चार होना पड़ा।

उनकी कहानियों में सहनशीलता का वह रूप अंकित है जिसके सीने में खामोश विद्रोह पलता रहता है। यही उनका उद्देश्य भी रहा। सतह के अंदर पलने वाली उष्मा कभी न कभी ज्वालामुखी के रूप में फूटती ही है।

कृति में, हाशिए पर जी रही मुस्लिम स्त्रियों के प्रजनन अधिकारों,अदम्य आस्था, अंतर्हित उर्जा और शोषण की गाथा को अत्यन्त संवेदनशीलता के साथ उकेरा गया है।मुस्लिम समाज की असीम जीवट और संभावनाओं से भरी बालिकाओं, लकीर की फकीर खूसट बुड्ढियों, पूर्वाग्रही मानसिकता से ग्रस्त मौलवियों तथा छली भाइयों की दास्तां हैरान कर देती है जो अनेक भावनात्मक उतार चढ़ावों के ताने बाने से बुनी गयी है। इसे सन 1990 से 1923 के मध्य के कालखण्ड की अविकल तस्वीर कहा गया है।

कृति का भाषायी स्वरूप भी चौंकाता है। बोलचाल की मजाकिया, जीवंत, कहीं मार्मिक तो कहीं कटुतिक्त भाषा, कथानकों में विश्वसनीयता पैदा करती है।

जाति और धर्म की दरारों को चीरती हुई, सतह के नीचे पनपती सड़ांध  और  ताप को उजागर करती हुई, हर मोड़ पर विस्मित करनेवाली यह कलाकृति अद्भुत है। 

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

नागपुर

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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