सुश्री इन्दिरा किसलय
☆ व्यंग्य ☆ शर्म को भी शर्म आने लगी है… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆
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कितने ही लोग आजकल शर्म का पता ढूंढने में लगे हैं। युद्ध स्तर पर खोज जारी है। इतनी शिद्दत से तो लोग रूठी हुई महबूबा का पता भी नहीं ढूंढते। वैसे तो हिंदुस्तानी हर दिन किसी न किसी गड़े मुर्दे का पता ढूंढ लाते हैं। महारत है उन्हें इस खोज में।
सदियों पहले जो अपने वजूद पर इतराती थी, नारियों का गहना कहलाती थी, या किसी गुनहगार की आत्मा जागने पर उसे पछतावा होता तो उसकी आँखें शर्म से झुका देती थीं, अब न जाने कहाँ गायब हो गई। इतनी तेजी से तो गधे के सिर से सींग भी गायब नहीं होते। थक हार कर गूगल की शरणागति स्वीकार की पर उसने भी हाथ खड़े कर दिए।
दिमाग पर कुछ और जोर डाला तो याद आया कि टी वी पर पैनल डिस्कशन में कुछ पैनलिस्ट अक्सर शर्म शर्म कहते हुए पाए गए थे। सिलसिला जारी है। लगा कि शायद ये जानते होंगे पर मायूसी ही हाथ लगी।
इधर न्याय की देवी की आँखों से पट्टी हटी और उधर शर्म बहरी हो गई। सालों पहले शर्म से मुलाकात हुई थी। मैंने पूछा था-कैसी हो तुम ? उसका जवाब था वैसी ही हूँ जैसे रहना चाहिए। मैंने कहा– तुम्हें जहाँ होना चाहिए वहाँ क्यों नहीं रहती हो? नाहक भटकती हो बंजारों की तरह? क्या तुम्हें अपना देश प्यारा नहीं? तुम में जरा सी भी देशभक्ति नहीं है? अन्यथा तुम ऐसा तो न करतीं। वो बोली मुझे तुमसे देशभक्ति का सर्टिफिकेट नहीं चाहिए। मुझे पानीदार आँखें पसंद हैं। सूखी आँखों में मेरा गुजारा नहीं होता। मुझे उसकी बातें सही लगीं।
शर्म किसी जहाँपनाह की बांदी तो है नहीं। उसका अपना अस्तित्व है। वह भी आजाद मुल्क की रहिवासी है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता उसके पास भी है। संगोल युग में उसका मन नहीं है संसद में रहने का, तो उसकी मर्जी। हम कौन होते हैं उसे विवश करने वाले? शर्म उन आँखों की तलाश में हलाकान हो गई है, जहाँ वह पूरी इज्जत से रह सके। शिक्षा, चिकित्सा, व्यवसाय, अभियांत्रिकी, खेल, पुलिस, न्याय, राजनीति, फिल्म, बैंक, पोस्ट वह हर विभाग का चक्कर लगा आई पर कहीं भी उसे आशियाना न मिला। कहीं कहीं तो लोगों ने शर्म शब्द ही नहीं सुना है। किसी ने तो ये पूछा—ये किस चिड़िया का नाम है ? शर्म शब्द के मानी क्या हैं?
पुरुष मुक्ति आंदोलन की मुखिया एक स्त्री को देखा जो व्यभिचारी के हक में रैली निकाल रही थी तो उसके पाँवों तले ज़मीन खिसक गई। उसे बड़ी उम्मीद थी महिलाओं से पर वो भी ध्वस्त हो गई।
मीडिया की आंखें तो कुबेरों के यहां गिरवी पड़ी हैं। शर्म को लग रहा है कि वह रेतीली आंखों से घिर गई है। वह अतीत की यादों में बिसूरने लगी– जाने कहाँ गए वो दिन— जब शर्म गहना हुआ करती थी। मनोचकित्सक इसे आत्मविश्वास की कमी कहते हैं कहते रहें पर वे उसकी महिमा को नहीं जानते। कवि रहीम कहते हैं —“रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून। पानी गए न ऊबरै मोती मानुस चून।। “
अब उम्मीद की कोई किरण नजर नहीं आती। मुल्क के हालात देख कर शर्म को भी शर्म आने लगी है।।
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© सुश्री इंदिरा किसलय
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





