सुश्री इन्दिरा किसलय
☆ आलेख ☆ युद्ध… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆
(वन लाइनर)
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वे शांति- स्थापना को संकल्पित हैं। उन्हें कलम की ताकत पर पूरा भरोसा है जितना ट्रंप को अपने सिरफिरे बयानों पर। लिहाज़ा एक बुद्धिवादी संगठन ने बुद्धिजीवियों को आमंत्रित किया है शांति स्थापना के लिए। कुछ लोग दो, तो कुछ लोग चार चक्रवाहिनियों पर सवार होकर बड़ी दूर से आए हैं। भई साहित्यकारों का भी तो कोई कर्तव्य बनता है कि नहीं !
बेशक वे अस्त्र-शस्त्रों से लैस नहीं हैं पर उनके पास शब्दों का आयरन डोम, शब्दों के मिसाइल, शब्दों के ड्रोन, शब्दों के बी-2 बाॅम्बर, शब्दों के एफ-35 क्या नहीं है उनके पास? ईरान-इजराइल युद्ध में इंसानियत का जनाज़ा निकलते देख कर वे कैसे चुप रह सकते हैं? यह तो कायरता हुई।
महाभारत काल, प्रथम विश्वयुद्ध, द्वितीय विश्वयुद्ध ब्ब्रिटेन का साम्राज्यवाद, बांग्लादेश, अमेरिका और वेनेजुएला, वियतनाम, अफगानिस्तान, यूक्रेन, इराक, सीरिया, लीबिया, गाज़ा, यू .एन सभी चर्चा के केंद्र में रहे। बुद्धिजीवियों के माथे पर चिंता का संजाल नज़र आया।
चाय-पानी पीकर लेखक ज्वाला जी निकले। उन्हें जरा भी चैन न था। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के खरबपति मालिक या युग के खलनायक, सनकी तानाशाह और बिजूका यू .एन। नक्कारखाने में तूती की आवाज भला कौन सुनेगा? वे बेहद अशांत थे। सभी शब्दों से शांति-शांति पुकार रहे थे जैसे वह आने ही वाली है। इस मंथन से मोहिनी की तरह अमृत घट लेकर प्रकट होने ही वाली है।
ज्वाला जी की आंखों के सामने शब्दों के समानांतर वो तस्वीरें उभर रही थी, ठीक उसी समय कितने ही लोग घायल, अपाहिज, लहूलुहान, मृत या भूखे-प्यासे तड़प रहे होंगे, गैस फील्ड, ऑयल रिफाइनरी जल रही होंगी ! आसमान काले धुएं से भर गया होगा। सायरन बज रहे होंगे। खण्डहर हो रही होंगी सारी इमारतें !
तो सचमुच शब्दों की शांति हुक्मरानों के सनकी दिमाग तक पहुंच पाएगी? ज्वाला जी स्वयं को समझा नहीं पा रहे थे, कहीं यह स्वयं को विचारक, चिंतक सिद्ध करने का निरीह प्रयास तो नहीं? या महज प्रदर्शन स्वयं को शांतिप्रिय सिद्ध करने का। उन्होंने सभी उपस्थितों की आंखों में, अगले दिन अखबार में छपनेवाली अपनी अपनी तस्वीरें, नाम, बयान देख लिए थे।
कहते हैं कुछ न करने से कुछ करना बेहतर है। क्या यह सही है? पर मौन भी तो ठीक नहीं। इसे मनुष्य को मनुष्य बनाए रखने की कोशिश कह सकते हैं ! उन्हें लग रहा है वे खुद को नहीं समझा पाएँगे। और वे लगातार स्वयं से युद्ध रत हैं।
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© सुश्री इंदिरा किसलय
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





