श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # २९ ☆
☆ आलेख ☆ ~ केलवा के पात पर उगे लन सुरुजमल… ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆
(प्रकृति के आराधना का पर्व -छठ)
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आज सांय अस्त होते सूर्य को अर्घ देने के साथ ही छठ महापर्व के पावन बेला पर भगवान भास्कर की प्रथम पूजा पूर्ण हुई। सदियों नहीं बल्कि युगों से परंपरागत ढंग से मनाए जाने वाली छठ पूजा आज करीब एक दशक बाद बड़े आत्मविश्वास के साथ एवं आत्म संतुष्टि के साथ यह बता पाने में सफल हुई, कि ये पुरबिहा लोग आखिर कौन सी पूजा करते हैं ? और किसकी पूजा करते हैं ?
दरअसल पूर्णतः प्रकृति की पूजा का यह पर्व अपने आत्म गौरव के साथ आज इतने दिनों बाद बताने में सफल हो रहा है कि पूरी दुनिया उगते हुए सूर्य को तो प्रणाम करती है लेकिन अस्त होते सूर्य की पूजा कोई नहीं करता और ऐसे अस्त होते सूर्य की पूजा करने से लाभ ही क्या ? जो अस्त होने के लिए उन्मुख है। लेकिन एक बड़ा जनमानस जो हर बार ट्रेन एवं बसों में धक्के खाते हुए अपने गांव परिवार और अपने घर सिर्फ इसीलिए पहुंचता है कि उसे प्रथम दिवस अस्त होते सूर्य को ही पूजना है। क्योंकि उसे पता था सूर्य अस्त ही कहां होता है। जिस समय यह अस्त हो रहा होता है तो कहीं उदय हो रहा होता है। इसका कारण यह कि वह सामान्य तो है नहीं !!! और सामान्य हो भी क्यों हो!!
इस पृथ्वी पर उगने वाली किसी भी वनस्पति की इतनी क्षमता नहीं, जो सूर्य के प्रकाश के बिना, या सूर्य की आभा के बिना, नदी या सरोवर में स्थिर या बहते जल के बिना स्वयं के जीवन या स्वयं के अस्तित्व को प्राप्त नहीं कर सकते। जब जब की वेद वेदांत में पौराणिक धर्म ग्रंथो में पांच भूतों की बात कही गई है सृष्टि के पंचभूत कोई और नहीं प्रकृति के ही पांच स्वरूप है।
श्री राम किशोर उपाध्याय जी की पुस्तक सृष्टि के गीत इन्हीं पांच भूतों की बात करती है। सूर्य अग्नि तत्वों के साथ पांच भूत का ही अंग है। मैं अपनी बात आगे रखता हूं
हालांकि यह सब मेरा अपना अनुभव है। एक समय हुआ करता था, हम शर्माते थे अपने ही कार्यालय में बैठ यह बात नहीं पाते हैं कि हमारा यह पर्व है क्या ? और इसका महत्व क्या है। हालांकि वह समाज,वह क्षेत्र जो इस सूर्य आराधना के पर्व को श्रद्धा पूर्वक तब भी मनाता था।
उसके आस्था विश्वास और ज्ञान की पराकाष्ठा यह थी कि ऐसे परिवेश में जन्म लेकर यहां की माटी पर लोटपोट कर जिसने ज्ञान के सर्वोच्च शिखर को छुआ, प्रशासनिक पदों पर रहकर अपने ज्ञान को सिद्ध करता रहा। विज्ञान और तकनीकी के क्षेत्र में ऊंची उड़ान भरकर यह बताता रहा कि हमारी खगोलीय संरचना क्या है, हमारे लिए सूर्य कितना महत्वपूर्ण है, उसके मन में दसको वर्ष पूर्व भी यह पर्व वैज्ञानिक पर्व था, आस्था के साथ-साथ प्रकृति की पूजा का पर्व था , नदियों और जल तालाबों के संरक्षण का पर्व था, कंदमूल फल जड़ी बूटियां, के महत्व को जानने का पर्व था , जलते हुए अखंड दीप का पर्व, डूबते हुए और अस्त होते हुए सूर्य से निकली हुई निर्विकार किरणों का पर्व था, अपने पूर्वजों के विश्वास का पर्व था, और आज भी उसके लिए श्रद्धा और विश्वास का पर्व है।
एक समय था जब हम परदेस में इस पर्व को मानते थे? हमारे सामने प्रश्न ही होते थे? आज हमारे पास प्रश्न नहीं बल्कि आज सबकी श्रद्धा और सब का विश्वास हमारे साथ है , साधारण विश्वास नहीं बल्कि हमसे ज्यादा अटूट विश्वास है।
निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति से लेकर सफलता के सर्वोच्च शिखर पर बैठा हुआ प्रत्येक व्यक्ति, हर कोई एक साथ, एक कतार में ,एक ही नदी और एक ही तालाब में, घुटने भर पानी में, खड़े होकर अस्त होते सूर्य को निहार, उसको प्रणाम करने, उदय होते हुए सूर्य की अगवानी करने और उसका उसको अर्घ समर्पित करने का सुखद सौहार्दपूर्ण समय ढूढ़ता है।
भगवान भास्कर हमारे जीवन में, अपनी सतरंगी किरणों के द्वारा नवीन विकास के पथ को अपने प्रकाश से प्रकाशित करें। भारत दिन-रात नित नवीन ऊंचाइयों को छू छुए और, इसी प्रकार विकासोंमुख बना रहे।
आप सभी को छठ महापर्व की हार्दिक बधाई…💐🙏
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© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”
लखनऊ, उप्र, (भारत )
दिनांक 22-02-2025
≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





