श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ३८ ☆
☆ लघुकथा ☆ ~ लेखक लोकेश के विचार ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆
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लोकेश की कलम उसके मन के भावों को पढ़ रही थीl लेकिन लोकेश का मन उथल-पुथल एवं बेचैनी से खुद को अलग ही नहीं कर पा रहा थाl नतीजा यह हुआ कि उसका आलेख उथल-पुथल और बेचैनी भरा ही उतराl लेख तो लेख था,लिखा गया तो उसे कहीं न कहीं उतरना ही थाl किताब के पन्नों में उतरकर लोगों के दिल में उतरना इन लेखों की फितरत होती हैl
लोकेश ने यह लेख कब लिखा और कब किताब के पन्नों में समाया, वह स्वयं ही भूल ही गया थाl धीरे धीरे काफी समय बीत गयाl
अब लोकेश एक बड़ा साहित्यकार और दर्शन शास्त्र का प्रवक्ता बन गया थाl उसके हर शब्द, हर वाक्य एक विचार बन गए थेl ऐसे विचार जो समाज को प्रेरणा देते थेl अब लोग लोकेश की लिखी हर पंक्तियों को लोकेश के विचार मानकर उसका आदर और अनुसरण करते थेl
सभागार में आज काफी भीड़ थीl लोकेश एक से एक सुंदर विचारों का प्रतिपादन कर रहे थेl दर्शक बड़ी ही शालीनता, धैर्य और गंभीरता के साथ लोकेश की हर बात को सुन रहे थे और अपने मन में उतार रहे थेl
अचानक सभागार में शोरगुल हुआl पीछे की पंक्तियों में बैठे हुए दो युवक समूहों के मध्य आपस में किसी मुद्दे पर गरमा गरम बहस होने लगी थीl युवकों का एक समूह बड़ी ही बेबाकी और दावे के साथ कह रहा था कि ये विचार लोकेश सर के हो ही नहीं सकतेl जबकि दूसरा समूह कह रहा था कि अरे भाई! आकर अपनी आंखों से देखा तो लो ये विचार लोकेश सर की ही एक पुस्तक में छपे हुए थेl मैं कहीं अन्यत्र से कोई विचार लाकर नही रख रहा हूँl युवक बार-बार लोकेश के उस पुस्तक का नाम भी ले रहे थे जिसमें ये विचार छपे थेl
मंच से संबोधन कर रहे लोकेश को अतीत में लिखी हुई अपनी उस पुस्तक का स्मरण हो रहा थाl यह विचार वास्तव में उसी के विचार थेl लेकिन मंच पर वक्ता के रूप सम्बोधन कर रहे लोकेश यह बताने का साहस नहीं जुटा पा रहे थे कि यह विचार आज मंच से मुख्य वक्ता के रूप में सम्बोधन कर रहे लोकेश के ही हैl अचानक लोकेश के अंतर्मन के लेखक ने उसके कानों में आकर कुछ कहा और लोकेश मंच से कुछ इस प्रकार का संबोधन करना शुरू कर दिए –
“मेरे प्यारे श्रोतागण ! मैं आपसे एक बात कहना चाहता हूंl यह जरुरी नही कि लेखक की लिखी हर बात सही ही होl लेखक के लेख तत्कालीन परिस्थितियों के आधार पर तो लिखे जाते ही जाते हैंl उससे भी बड़ी बात यह होती है कि लेख को लिखते समय लेखन की मन:स्थिति क्या है और उसका लेखकीय अनुभव कितना बड़ा हैl आज मैं इस बड़े मंच से हाथ जोड़कर आपसे अपील करना चाहता हूं कि मेरी ही पुस्तक में लिखे हुए मेरे ही इन विचारों को, मेरा विचार न मानते हुए, इसे अपने मन से निकाल देl आपको आज, वर्तमान के लोकेश की बात को माननी है न कि अतीत के उस लोकेश के विचारों का अनुसरण करना है, उसके वय उम्र में मानसिक उथल-पुथल के बीच लिखे गए थेl”
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© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”
लखनऊ, उप्र, (भारत )
दिनांक 22-02-2025
≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





