श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “दर्दे दिल…“।)

?अभी अभी # 644 ⇒  दर्दे दिल ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

(श्री प्रदीप शर्मा जी का यह आलेख उनके मित्र श्री राजेश गुप्ता जी द्वारा 1 अप्रैल को उनके जन्मदिवस पर साझा किया गया था। श्री प्रदीप शर्मा जी के मित्रों का दायरा विस्तृत है और मानवीय सम्बन्धों पर आधारित है। जितने उनके फेसबुक (आभासी) मित्र हैं उससे ज्यादा उनके वास्तविक मित्र हैं। उनकी मिलनसारिता ही उन्हें हमें और ई-अभिव्यक्ति से जोड़ती है। उन्हे जन्मदिवस की अशेष हार्दिक शुभकामनायें।)

सन् १९६५ में धर्मेंद्र और नंदा की एक फिल्म आई थी, आकाशदीप जिसमें रफी साहब का एक गाना है ;

मुझे दर्दे दिल का पता न था

मुझे आप किसलिए मिल गए।

मैं अकेले यूं जी मज़े में था

मुझे आप किसलिए मिल गए।।

मजरूह साहब ने यूं तो कई गीत लिखे हैं, लेकिन चित्रगुप्त के संगीत निर्देशन में रफी साहब ने इस गीत को इस खूबसूरती से गाया है, कि आज आपसे इस गीत के बारे में दिल की बात कहने से अपने आपको रोक नहीं पाया।

ईश्वर एक है, सत्य सनातन है। जो नास्तिक हैं, वे भी किसी एक अज्ञात शक्ति के अस्तित्व से इंकार नहीं कर सकते। डार्विन हो या मनु, Adam हो या Eve, सृष्टि की रचना तो हुई है। पहले पहल वाला जीव अमीबा हो या किसी का अब्बा, क्या फर्क पड़ता है। एक से ही अनेक की उत्पत्ति होती है। पहले ईश्वर अकेला था, बोर तो होगा ही, सोचा, चलो सृष्टि की रचना कर डालें। उधर सृष्टि की रचना हुई और इधर हमारे शायर की कलम चली।

मैं अकेले यूं ही मज़े में था, मुझे आप किसलिए मिल गए।।

शैलेन्द्र भी यही शिकायत करते हैं !

दुनिया बनाने वाले,

क्या तेरे मन में आई

काहे को दुनिया बनाई !

एक भक्त को पूरा अधिकार है, अपने आराध्य से प्रश्न पूछने का, जवाब तलब करने का। जब वह दुखी होता है, तो उस परम पिता से यही तो कहता है ;

दुनिया न भाये मोहे

अब तो बुला ले

चरणों में, चरणों में !

द्वैत और अद्वैत में एक भक्त नहीं उलझता, एक शायर नहीं उलझता। वह सिर्फ विरह और मिलन से परिचित है। बहुत कम ऐसे संतोष आनंद होते हैं, जो साहिर से सहमत होते हैं ;

जो मिल गया

उसी को मुकद्दर समझ लिया।

हर फिक्र को

धुएं में उड़ाता चला गया

मैं ज़िन्दगी का साथ

निभाता चला गया।।

इस जीव की पीड़ा भी यही है। वह जब अकेला होता है, तो उसे किसी के साथ की तलब होती है। अकेला हूं, मैं हमसफ़र ढूंढ़ता हूं। और जब कोई हमराही कुछ दूर चलकर साथ छोड़ देता है, तो दिल में एक दर्द दे जाता है, और तब उसे अहसास होता है ;

मुझे दर्दे दिल का पता न था।

मुझे आप किसलिए मिल गए।।

दुनिया में जो मिलता है, वह कुछ हमसे लेता है, तो कुछ देता भी है। दिल लेने देने में कौड़ी खर्च नहीं होती। एक उम्र ऐसी होती भी है ज़िन्दगी में, जब पैसा तो क्या दिल भी नहीं संभाला जाता। कोई लूट लेता है, कोई चुरा लेता है तो किसी को हम स्वयं तश्तरी में पेश कर देते हैं और शान से कहते हैं, हम दिल दे चुके सनम।

मैंने कभी किसी को दिल नहीं दिया, लेकिन मेरा दिल कितने लोग ले गए, मुझे पता ही नहीं। आपने यूं ही दिल्लगी की होगी। हम दिल की लगी समझ बैठे। मुझे दिल की कोई शिकायत नहीं, मेरा कोई दर्दे दिल नहीं। लेकिन मैं यह भी नहीं कह सकता कि मैं अकेले यूं ही मज़े में था, मुझे आप किसलिए मिल गए।।

अब हमारा आपका रिश्ता ही ले लीजिए ;

यूं ही अपने अपने सफ़र में गुम

कहीं दूर मैं, कहीं दूर तुम

चले जा रहे थे, जुदा जुदा

मुझे आप किसलिए मिल गए ?

बस इस प्रश्न का जिस दिन उत्तर मिल जाएगा, हमारा मिलना, बिछड़ना, दिल से दिलों का रिश्ता, एक नई इबारत लिख जाएगा। अपने दर्द को सब महसूस करते हैं, लेकिन जब किसी से दिल का रिश्ता कायम होता है, तो दुनिया बदल जाती है। शैलेन्द्र और राजकपूर सरल आम भाषा में जो हमको समझाना चाह रहे थे, वह और कुछ नहीं, हमारे दिलों को आपस में जोड़ना ही था।

हमारे दिलों की दूरियां कम हों, एक दूसरे का दर्द समझ सकें, बहुत गिर गए गिरने वाले, खुद उठ सकें, औरों को उठा सकें, हमारे आपस में मिलने का मक़सद समझ सकें। ईश्वर ने हमें मिलाया ही इसलिए है, कि हम एक दूसरे के दर्द को महसूस कर सकें।।

मुझे दर्दे दिल का पता न था

मुझे आप इसलिए मिल गए …

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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