श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अभी तो मैं जबान हूं !।)

?अभी अभी # ७६३  ⇒ आलेख – अभी तो मैं जबान हूं ! ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

अभी तो मैं जबान हूं ! जी हां, कुछ लोग जवान को जबान और जवानी को जबानी कहते हैं । जबान मैं हूं, जबान तुम हो, जबानी ओ दीबानी तू जिंदाबाद ।

इसमें क्या गलत है, जवानी में सब फिसलते हैं और फिर चमड़े की जबान है, थोड़ा फिसल गई । जबान जवान ही तो हुई, कोई बूढ़ी तो नहीं हो गई । जबान भी सोचती होगी, तुम हसीन मैं जबान ।

हम जब छोटे थे, पालने में थे, तब यही जबान, हमारी नन्हीं सी जबान थी, तब हम बच्चे थे,  नादां थे, नाजुक थे, बेजुबां थे ।

हमने बढ़ना शुरू किया, बड़ा होना शुरू किया, पहले घुटनों के बल चले, फिर अपने पांवों पर भी खड़े होने लग गए, हमने ढाई आखर लाड़ दुलार और प्रेम के क्या सीखे, हम तो तुतलाने लगे । ऑटो करेक्ट होते होते कुछ ही समय में हमारी तो जबान भी चलने लगी । मुंह में रहते हुए भी शब्दों के साथ वाक्य गीतांजलि खेलने लगी ।।

और लीजिए,  शनैः शनैः हम जवां होने लगे और हमारी जुबां भी जवान होने लगी । जबान और जवानी क्या किसी के रोके कभी रुकी है । चलो हम अपनी जबान को तो लगाम दे भी दें, अपने काबू में कर लें, लेकिन इस कमसिन और नादां जवानी का क्या किया जाए । दोनों किसी को नजर नहीं आएं, चल, चल दरिया में डूब जाएं ।

कहना बहुत आसान है । बहुत कठिन है डगर पनघट की ! हमारी जबान, बोनलेस tongue है, बहुत ही नाजुक, बत्तीस दांतों के पहरे में रहने वाली । दांत तो बड़े बेशर्म हैं, मुंह खोलते ही नजर आ जाते हैं । मोतियों जैसे सफेद सफेद दांत कैसे चमचमाते हैं । लेकिन हमेशा परदे में बंद बेचारी जुबां थोड़ी भी बाहर निकली तो बेशर्म कहलाने लगती है । मम्मी देखो, भैया हमें जीभ दिखा दिखाकर चिढ़ा रहा है, मुझसे ठीक से, बात भी नहीं कर रहा ।।

जीभ रसेन्द्रिय है । नाक अगर सूंघ सकती है, तो जीभ चख सकती है । देख परायी चूपड़ी, मत ललचाये जीव । जब बच्चे थे, तब नादानी में लार टपकती थी, अब जवान हैं, तो मत पूछिए, कहां कहां लार टपकती है । बधाई हो बधाई जन्मदिन पे तुमको । तुम्हारी होगी शादी, मिलेंगे लड्डू हमको । बचपन में तो मंदिर में आरती के बाद प्रसाद के लिए, कैसे हाथ फैलाते थे । बड़ा अफसोस होता था, हमारी नन्हीं नन्हीं सी नाजुक हथेली । बार बार प्रसाद खाया, शर्ट से हाथ पोंछा, और फिर वापस, प्रसाद की कतार में ।

चलिए, खाने की बात छोड़िए, यह नाजुक सी जबान तो मुंह में रहती हुई भी कितनी चलती है । इसे इस मुंह में आजीवन कारावास की सजा सुनाई हुई है, यह एक बार कट सकती है, लेकिन मुंह के बाहर कदम नहीं रख सकती । बेचारी बत्तीस दांतों की पहरेदारी और रखवाली में, ठीक से सांस भी नहीं ले सकती ।।

कितना छोटा है इसका कार्य क्षेत्र । लेकिन अगर यह बंद जुबां, अगर एक बार खुली, तो फिर किसी के बस की नहीं । कभी मीठी, कभी कड़वी, कभी बेजुबां तो कभी बदज़ुबां ।

खुद कभी लड़ती नहीं, लेकिन सबको लड़ाती है । द्रौपदी ने बस इतना ही तो कहा था, अंधे का बेटा अंधा, और इसी बात पर महाभारत शुरू हो गई थी ।

हम नहीं मानते मर्द की जबान मर्द की जबान होती है और औरत की जबान एक औरत की जबान । बेचारी औरत तो वैसे भी बड़ी कमजोर है । अगर कभी बित्ते भर की जबान अगर चल भी गई, तो क्या गुनाह हो गया । किसी के हाथ चलेंगे, तो किसी की जबां भी चलेगी । हमारी जबान ने चूड़ियां नहीं पहन रखी । एक बात का जवाब दस से, दस का हजार से, हजार का …..बस, ज्यादा मुंह मत

खुलवाओ । वे कह रहे हैं, कंट्रोल, कंट्रोल ;

बालू जैसी करकरी

उजल जैसी धूप,

ऐसी मीठी कछु नहिं

जैसी मीठी चुप ;

यह जबान अगर चिकनी चुपड़ी बातें करना जानती है, तो यही जबान जहर उगलने में भी उस्ताद है ।

जब भी यह जबान फिसली है, बहुत कुछ फिसला है । बोलने में और खाने में,  इस पर दोनों में लगाम लगाना जरूरी है ।

यह कसम खा खाकर झूठ बोल सकती है। इससे सच उगलवाने के लिए आजकल मशीनों की सहायता भी लेनी पड़ती है ।

ऐसा क्या है, इस लचीली, हमेशा जवां जबान में,  कि यह कभी बूढ़ी ही नहीं होती, कभी रत्ती भर थकती तक नहीं । जिरह, बहस, प्रतिवाद,  भाषण, प्रवचन जितना चाहे करा लो, बैठ जाए गला तो बैठ जाए गला, जुबां कभी हार नहीं मानती । हमेशा जवां रहती है यह जबान, इसीलिए तो इसे कहा गया है, अभी तो मैं जबान हूं, और इसीलिए जवान हूं ।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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