श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सुर की गति मैं क्या जानूं …“।)
अभी अभी # ८१४ ⇒ आलेख – सुर की गति मैं क्या जानूं
श्री प्रदीप शर्मा
एक दुनिया गीत, संगीत की होती है, जहां सुर, ताल और लय की बात होती है, कभी कानों में शहनाई गूंजती है तो कभी बांसुरी की धुन।
धुन एक मन की दशा भी है, कुछ लोग धुन के पक्के होते हैं तो कुछ रियाज के।
हमारे कान हमेशा कुछ अच्छा सुनने के लिए लालायित रहते हैं। दूर कोई गाए, धुन ये सुनाए। हमारे आसपास इतनी आवाजें होती हैं, लेकिन हमारे कान उधर ही लगे रहते हैं, जहां हमारा ध्यान होता है। धुन और ध्यान के बिना कोई भी साधना संभव नहीं।
हर व्यक्ति सुर का जानकार नहीं होता, लेकिन कर्णप्रिय शब्द क्या है और कर्कश स्वर क्या है, यह वह अच्छी तरह जानता है। कानों को भी मीठे बोल ही सुहाते हैं, कड़वे वचन तो सिर्फ आचार्य तरुण सागर जी के ही भाते हैं। सुन साइबा सुन, प्यार की धुन।।
मुकेश का एक प्यारे गीत का मुखड़ा, आज के अभी अभी का शीर्षक है, सुर की गति मैं क्या जानूं, बस एक भजन करना जानूं। बस, बिल्कुल यही हाल मेरा भी है, मुझे सुर का पता नहीं, सरगम मुझे नहीं आती, अच्छा सुन लेता हूं, लेकिन गा नहीं पता, टेबल पर थाप देता रहता हूं, तबला बजाना मुझे नहीं आता, लेकिन जब यह पता चला कि मुकेश का यह प्रिय भजन राग हमीर पर आधारित है, तो अचानक मुझे फिल्म कोहिनूर का वह गीत याद आ गया, गिरधर की मुरलिया बाजे रे, मधुबन में राधिका नाचे रे। संगीत के रसिक और जानकार राग हमीर पर आधारित ऐसे कई गीत जानते होंगे, लेकिन मेरी स्थिति तो बस यही है, सुर ना सजे, क्या गाऊं मैं। फिर भी बस इतना जरूर मुझे पता है कि सुर के बिना जीवन सुना है।
ईश्वर को पाने के कई साधन हैं, कई रास्ते हैं, लेकिन सभी रास्ते प्रेम के मार्ग से ही होकर जाते हैं। जहां प्रेम है, वहां गीत है, संगीत है, सुर है, कहीं लता है तो कहीं जगजीत है। आने से उसके आए बहार, जाने से उसके जाए बहार। कहीं कोयल की कूक है, तो कहीं पपीहे की पीहू पीहू। जब शोर वाले किशोर गा उठते हैं, पायल वाली देखना, यहीं तो कहीं दिल है, पग तले आए ना, तो दांतों तले उंगली दबाने का मन करता है।।
मन्ना डे और किशोर कुमार का जबर्दस्त संघर्ष हमें एक चतुर नार में देखने को मिलता है। बेचारे मास्टर जी सुर ढूंढते ही रह जाते हैं और भोला बिंदु को ले उड़ता है। मनोरंजन से भरपूर, एक हास्य गीत होते हुए भी मन्ना डे, किशोर कुमार और पंचम अपना कमाल बता ही जाते हैं।
तुम नाचो, रस बरसे। बस यही सुर है, यही साधना है। मन मोर हुआ मतवाला, ये किसने जादू डाला। संगीत कान खोलकर और आंख मूंदकर सुनने की चीज है। मतवाली नार, ठुमक ठुमक चली जाए। रोक सको तो, रोक लो अपनी पायल की झंकार। साज हो तुम, आवाज हूं मैं। सुर सधे तो गाएं, साज बजे, तो बजाएं, बाकी हमारे साथ प्रेम की बांसुरी बजाएं, ईश्वरीय संगीत में खो जाएं। मेरे संग गा, गुनगुना। कोई गीत सुहाना, मेरे संग गा।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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