श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है नवीन आलेख की शृंखला – “ परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख ☆ परदेश – भाग – 5 – परदेश की ट्रेल (Trail) ☆ श्री राकेश कुमार ☆

अमेरिका में  प्राकृतिक और विकसित किए गए वन में विचरण करने के लिए रास्ते बनाए गए है, और कुछ स्वयं बन गए है, उनको ही ट्रेल की संज्ञा दी गई हैं। हमारे देश की भाषा में खेतों की मेड़ या पगडंडी जो सघन वन क्षेत्र में आने जाने के रास्ते के रूप में उपयोग किया जाता हैं, को भी ट्रेल कह सकते हैं।                     

शिकागो शहर में भी ढेर सारी ट्रेल हैं। वर्तमान निवास से आधा मील की दूरी पर विशाल वन भूमि जिसमें छोटी नदी भी बहती है, क्षेत्र में ट्रेल बनाई गई हैं। मुख्य सड़क से कुछ अंदर जाकर गाड़ियों की मुफ्त पार्किंग व्यवस्था हैं। बैठने के लिए बहुत सारे बेंच/टेबल इत्यादि वन विभाग ने मुहैया करवाए गए हैं। कचरा डालने के लिए बड़ी संख्या में पात्र रखवा कर सफाई व्यवस्था को भी पुख्ता किया गया हैं।

मई माह से जब यहां पर भी ग्रीष्म ऋतु आरंभ होती है, तब  निवासी बड़ी संख्या में यहां आकर भोजन पकाते (Grill) हैं। लकड़ी के कोयले को छोटे छोटे चुहले नुमा यंत्र में जला कर  बहुतायत में नॉन वेज तैयार किया जाता हैं। सुरा और संगीत मोहाल को और खुशनुमा बनाने में कैटलिस्ट का कार्य करते हैं।

ट्रेल में थोड़े से पक्षी दृष्टिगोचर होते हैं।मृग अवश्य बहुत अधिक मात्रा में विचरण करते हुए पाए जाते हैं।

ट्रेल को लाल, पीले, हरे इत्यादि रंग से विभाजित किया गया हैं। भ्रमण प्रेमी रास्ता ना भटक जाएं इसलिए कुछ दूरी पर लगे हुए पिलर पर रंग के निशान देखकर हमको अपने दिल्ली मेट्रो की याद आ गई। वहां भी इसी प्रकार से अलग अलग रूट्स को रंगों से विभाजित किया गया हैं। कुछ स्टेशन पर एक लाइन से दूसरी लाइन पर भी यात्रा की जा सकती हैं। यहां ट्रेल में भी प्रातः भ्रमण करने वाले भी तिगड़ों /तिराहों पर अपना मार्ग रंगानुसार बदल सकते हैं।

ट्रेल सूर्योदय से सूर्यास्त तक खुला रहता हैं। श्वान पालक भी यहां विचरण करते हुए पाए जाते हैं, लेकिन चैन से बांधना सख्ती से अनिवार्य होता है, वर्ना श्वान हिरण जैसे जीवों के लिए घातक हो सकता हैं। साइकिल सवार भी यहां दिन भर पसीना बहा कर स्वास्थ्य रहते हैं। बहुत से लोग तो धूप सेक कर शरीर के विटामिन डी के स्तर को बनाए रखते हैं। शीतकाल में तो सूर्यदर्शन भी दुर्लभ होते हैं।

वर्तमान समय में तो गर्मी, वर्षा और तीव्र वेग से हवाएं चलने का मौसम है। मौसम गिरगिट जैसे रंग बदलता है, ऐसा कहना भारतीय राजनीति के उन नेताओं का अपमान होगा, जो अपनी विचार धारा को अनेक बार बदल कर दलगत राजनीति में अपने झंडे गाड़ चुके हैं।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान) 

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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