श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – अनमोल बंधन।)
☆ लघुकथा # ७९ – अनमोल बंधन ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆
रागिनी पुराने फोटो एल्बम देख रही थी। एल्बम की एक-एक फोटो को घंटों निहार रही थी और अतीत की यादों में खो गई थी…
अभी 2वर्ष पहले की ही तो बात है उसके इकलौते भाई को ब्रेन हेमरेज हो गया था। दिन रात उसकी याद में आंसू निकलने लगे। वह सोचने लगी कि राखी में क्यों ना भैया के नाम से राखी में भगवान कृष्ण के मंदिर में जाकर उन्हें ही बंधा दूं।
अचानक वह अतीत से वर्तमान में आ गई और तैयार होकर मंदिर की ओर अपने कदम जल्दी से बढ़ने लगी साथ ही उसने मिठाई भी खरीद ली। दुकान में मिठाई खरीद रही थी तो अचानक उसने देखा कि दुकान में अंकल जी का बेटा बैठा हुआ था जो उसे अपने भाई की तरह ही लग रहा था। पीछे से उसने देखा, उसके मुंह से निकल गया अमित।
उसने कहा दीदी कुछ चाहिए क्या आपको मेरा नाम अमित नहीं अजय है। भैया मैंने मिठाई ले ली है और राखी भी लेकिन तुम मुझे बिल्कुल अपने भाई की तरह लग रहे हो।
आँसू भर कर बोली “भैया”।
इतनी दर्द है जीवन में, क्या-क्या बोलूं? कोई बात नहीं और दुकान से जाने लगी। तभी अजय ने कहा कोई बात नहीं दीदी आप मुझे यह धागा बांध दीजिए क्या मैं आपके भाई जैसा नहीं हूँ?
रागिनी की खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा आंसू तो अभी निकल रहे थे पर इन आंसू के साथ मुस्कान थी। उसने उसे राखी बांधी और मिठाई खिलाया उसने पैर छूकर एक सुंदर सा पर्स उसे दिया और बोला दीदी मेरी भी कोई बहन नहीं है पिताजी का अकेला ही बेटा हूं इंजीनियर की पढ़ाई बेंगलुरु से कर रहा हूं, अभी छुट्टियों में आया हूं। दुकान से घर के लिए कुछ सामान लेकर आया था कि सभी को अपनी बहन को उपहार देना होगा। शायद आपके लिए ही खरीदा था।
मुझे भी इतना सुंदर रिश्ता मिल गया।
भैया तभी तो लोग भाई बहन के बंधन को अनमोल बंधन कहते हैं।
© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’
जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




