श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – जीवन का सबक।)
☆ लघुकथा # ८४ – जीवन का सबक ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆
आज मन बहुत उदास है, जाने क्यों पुरानी बातें आज बहुत याद आ रही हैं। मां बाबूजी की गाड़ी 4:00 बजे स्टेशन में आ जाएगी। पतिदेव लेकर उन्हें घर पर 5:00 बजे तक आ जाएंगे। हमने शादी अपने मन से की थी। हम दोनों नौकरी करते हैं वह गांव के हैं उन्हें हमारा इस तरह से रहना अच्छा नहीं लगता। वे शादी के सख्त खिलाफ थे आज 10 साल के बाद उन्हें हमारी याद आई है।
फिर अचानक वह सोचने लगती है कि- मेरी क्यों याद आई? वे अपने बेटे और पोते उज्जवल को देखने आए हैं।
भाई को भी हफ्ते भर की छुट्टी दे दी है ऑफिस का काम भी घर से करना है जाने कैसे सब होगा?
तभी अचानक गाड़ी रूकती है और वह साड़ी पहन कर सिर पर पल्लू रखकर दरवाजा खोलती है और अपने सास ससुर को चरण स्पर्श कर प्रणाम करती है।
और तुरंत रसोई में जाकर मिठाई, नमकीन और पानी रखती है और चाय बनाने के लिए रसोई में जाती है।
तभी अचानक उसकी सास कहती है- अरे तुम्हें इतना सब आता है यह तो हमें पता ही नहीं था चाय भी तुम बना लेती हो?
सारे घर का काम खुद करती हो हमें तो लगा नौकर चाकर होंगे?
तभी ससुर जी ने बड़े प्यार से सर पर हाथ फेरा और कहा बेटी हमारे लिए तुम्हें साड़ी पहनने की कोई आवश्यकता नहीं है जैसे कपड़े पहनती हो वैसे पहनो और आराम से रहो मैं तुम्हारी शादी के खिलाफ था पर अब बदल गया हूं।
तुम्हारे देवर और नंद ने मुझे बहुत कुछ सिखा दिया उनकी शादी मैंने अपनी मर्जी से की पर आज तक उनसे मुझे कोई इज्जत नहीं मिली तुम्हारी मां को तुम्हारी घर गृहस्थी और फोटो को देखने का बहुत मन था आप जीवन के कितने दिन बचे हैं इसलिए हम लोग यहां पर कुछ दिनों के लिए आए पर तुम्हें मिलकर और यह तुम्हारा स्वभाव देखकर ऐसा लगा कि हमने इतने सालों तक ऐसी गलती क्योंकि?
किसी को भी देखे बिना उसके बारे में हमें राय नहीं बननी चाहिए थी। जीवन तो चलता ही रहता है बस खुश रहना चाहिए। जीवन का यह सबक बहुत देर से हमें मिला पर मिल ही गया चलो हम सब मिलकर आज बाहर खाना खाकर आते हैं।
© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’
जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




