जगत सिंह बिष्ट
(मास्टर टीचर : हैप्पीनेस्स अँड वेल-बीइंग, हास्य-योग मास्टर ट्रेनर, लेखक, ब्लॉगर, शिक्षाविद एवं विशिष्ट वक्ता)
☆ पुस्तक चर्चा 🌺 वैशाली की नगरवधू🌺 श्री जगत सिंह बिष्ट ☆
🍀आचार्य चतुरसेन की अनुपम कृति🍀
आज से लगभग पचास साल पहले यह पुस्तक पढ़ी थी। तब कितनी समझ में आई, याद नहीं। अभी इसको फिर से पढ़ा है, इत्मीनान से।
दोबारा पढ़ने की वजह भी स्पष्ट कर दूं। मैंने कहीं पढ़ा कि आचार्य चतुरसेन ने कहा था, “मैं अब तक की अपनी सारी रचनाओं को रद्द करता हूं और ‘वैशाली की नगरवधू’ को अपनी एकमात्र रचना घोषित करता हूं।”
यह भी कहीं पढ़ा कि मुंशी प्रेमचंद ने बनारस में आचार्य चतुरसेन से कहा था, “लिखते तो आप हैं, मैं तो कलम रगड़ता हूं।”
अम्बपाली जब अठारह वर्ष की आयु पूरी कर चुकी तो वैशाली जनपद ने उसे सर्वश्रेष्ठ सुंदरी निर्णीत किया। वज्जी गणतंत्र के कानून अनुसार उसे ‘वैशाली की नगरवधू’ घोषित किया जाना था।
शुभ्र कौशेय धारण किए हुए अम्बपाली संथागार में उपस्थित हुई। वह अपना मत परिषद के सामने प्रकट करने के लिए प्रस्तुत हुई थी। अम्बपाली के होंठ हिले और वीणा की झंकार के समान उसकी वाणी ने सुधावर्षण किया, “भंते, आपके आदेश पर मैंने विचार कर लिया है। मैं वज्जीसंघ के धिक्कृत कानून को स्वीकार करती हूं। मैं सहस्र बार इस शब्द को दोहराती हूं। वज्जीसंघ का यह धिक्कृत कानून वैशाली जनपद के यशस्वी गणतंत्र का कलंक है। भंते, मेरा अपराध केवल यही है कि विधाता ने मुझे यह अथाह रूप दिया। इसी अपराध के लिए आज मैं अपने जीवन के गौरव को लांछना और अपमान के पंक में डुबो देने को विवश की जा रही हूं।”
उसने अपनी कुछ शर्तें रखीं। पहली शर्त यह कि उसे रहने के लिए सप्तभूमि प्रासाद, नौ कोटि स्वर्णभार, प्रासाद के समस्त साधन और वैभव सहित दिया जाए। दूसरी शर्त यह कि उसके आवास की दुर्ग की भांति व्यवस्था की जाए और तीसरी यह कि उसके आवास में आने-जाने वाले अतिथियों की जांच-पड़ताल गणकाध्यक्ष न करें।
प्रारंभ में जिस सुख-सज्जा को उसने तुच्छ समझा था, वह अब उसके जीवन की अनिवार्य सामग्री हो गई थी। लेकिन अब भी संपूर्ण वैशाली के प्रति उसका पूर्ण विद्रोह जस का तस विद्यमान था।
एक दिन एकाएक आंख खुलने पर उसने देखा, उस सुरक्षित लताकुंज में एक प्रभावशाली पुरुष उसके सम्मुख खड़ा है। उसके एक हाथ में अप्रतिम वीणा है। अंबपाली ने उस रहस्यमय पुरुष का परिचय जानना चाहा।
उन्होंने वीणा झंकृत की। अंबपाली मूढ़वत बैठी रही। वह टकटकी बांधकर वीणा पर विद्युत-वेग से थिरकती उंगलियों को देखते-देखते अचेत-सी हो गई।
उसी अचेतन अवस्था में उसने उठकर नृत्य करना प्रारंभ कर दिया। नृत्य और वादन एकीभूत हो गया। कौन नृत्य कर रहा है, कौन वीणावादन और कौन उस अलौकिक दृश्य को देख-सुन रहा है, यह नहीं कहा जा सकता था।
1938 में आचार्य चतुरसेन को उपचार के सिलसिले में बिहार जाना पड़ा। वहां पहाडि़यों में भटकते हुए और जलस्रोत में घंटों स्नान करने के दौरान वे एक जागृत स्वप्न देखने लगे। ऐसा लगने लगा जैसे कोई ग्रंथ लिख रहे हों। आंखों के सामने दृश्य बनने लगते। पत्तों की बातचीत प्रत्यक्ष कानों में पड़ने लगी। उनके मस्तिष्क में अम्बपाली की छवि बनने लगी. अजंता एलोरा के भ्रमण के बाद अम्बपाली की मूर्ति आकार ले चुकी थी। वे इस छवि के साथ इतना घुलमिल गए थे कि एक दिन जब वे खुले आकाश तले चांदनी रात में लेटे थे तो आसमान में सजीव मूर्ति दिखाई दी।
‘मेरी आत्मकहानी’ में वे लिखते हैं, “मेरे शरीर के संपूर्ण जीवकोष कल्पना के वशीभूत हो गए और मैंने कहा – नाचो अम्बपाली! और अम्बपाली नाची। मैंने अपनी आंखों से उसे नील गगन में चंद्रमा के उज्ज्वल आलोक में नाचते देखा। मुझे ऐसा प्रतीत हुआ जैसे मैं भी आकाश में उसके निकट पहुंच गया हूं। एकाएक मुझे प्रतीत हुआ कि वह मूर्ति गायब हो गई। मैं दृढतापूर्वक कहता हूं कि मैंने स्वप्न नहीं देखा था। मैंने जो कुछ देखा जागते हुए देखा। सब सत्य। उस समय रात्रि के दो बजे थे। मेरे साहित्य लेखन का यही समय है। मैंने तुरंत उठकर उस नृत्य का वर्णन लिखा, जिसका संशोधित रूप ‘वैशाली की नगर वधू’ में कलमबद्ध है।”
उपन्यास में भावों का चित्रण और भाषा का सौष्ठव अद्भुत, अप्रतिम, अलौकिक है। पाठकों के आनंद के लिए एक प्रसंग ज्यों का त्यों प्रस्तुत है:
“युवक ने समूचा भुना हुआ हरिण कंधे पर लादकर ज्यों ही कुटी में प्रवेश किया, वह वहां का दृश्य देखकर आश्चर्य-चकित जड़वत् रह गया। उसने देखा, पारिजात कुसुम-गुच्छ की भांति शोभाधारिणी एक अनिंद्य सुंदरी दिव्यांगना कुटी में आत्मविभोर होकर असाधारण नृत्य कर रही है।
“उसके सुचिक्कण, घने पादचुंबी केश-कुंतल मृदु पवन में मोहक रूप में फैल रहे हैं। स्वर्ण-मृणाल-सी कोमल भुज-लताएं सर्पिणी की भांति वायु में लहरा रही हैं। कोमल कदली-स्तंभ-सी जंघाएं व्यवस्थित रूप में गतिमान होकर पीन नितंबों पर आघात-सा कर कटि-प्रदेश को ऐसी हिलोर दे रही हैं जैसे समुद्र में ज्वार आया हो। कुंदकली-सा धवल गात, चंद्रकिरण-सी उज्ज्वल छवि और मुक्त नक्षत्र-सा दीप्तिमान मुखमंडल– सब कुछ अलौकिक था।
“क्षण-भर में ही युवक विवश हो गया। उसने आखेट एक ओर फेंककर वीणा की और पद बढ़ाया। अंबपाली के पदक्षेप के साथ वीणा आप ही ध्वनित हो रही थी। युवक ने वीणा उठा ली, उस पर उंगली का आघात किया, नृत्य मुखरित हो उठा।
“अब तो जैसे ज्वालामुखी ने ज्वलित, द्रवित सत्त्व भूगर्भ से पृथ्वी पर डंडेलने प्रारंभ कर दिए हों, जैसे भूचाल आ गया हो, पृथ्वी डगमग करने लगी हो। वीणा की झंकृति पर क्षण-भर के लिए देवी अंबपाली सावधान होती और फिर भाव-समुद्र में डूब जाती।
“उसी प्रकार देवी सम पर ज्यों ही पदक्षेप करती और निमिषमात्र को युवक की अंगुली सम पर आकर तार पर विराम लेती, तो वह निमिष-भर को होश में आ जाता। धीरे-धीरे दोनों ही बाह्यज्ञान-शून्य हो गए।
“सुदूर नील गगन में टिमटिमाते नक्षत्रों की साक्षी में, उस गहन वन के एकांत कक्ष में ये दोनों ही कलाकार पृथ्वी पर दिव्य कला को मूर्तिमती करते ही रहे। उनके पार्थिव शरीर जैसे उनसे पृथक हो गए। उनका पार्थिव ज्ञान लोप हो गया, जैसे वे दोनों कलाकार पृथ्वी के प्रलय हो जाने के बाद समुद्रों के भस्म हो जाने पर, सचराचर वसुंधरा के शेष-लीन हो जाने पर, वायु की लहरों पर तैरते हुए ऊपर आकाश में उठते चले गए हों और वहां पहुंच गए हों जहां भू: नहीं, भुवः नहीं, स्क: नहीं, पृथ्वी नहीं, आकाश नहीं, सृष्टि नहीं, सृष्टि का बंधन नहीं, जन्म नहीं, मरण नहीं, एक नहीं, अनेक नहीं, कुछ नहीं, कुछ नहीं!”
यह विशाल फलक की एक कालजयी कृति है। कहानी वैशाली और मगध साम्राज्यों, आसपास और दूर-दूर के छोटे राज्यों के लोक-जीवन, संस्कृति और राजनीतिक उठापटक के इर्दगिर्द घूमती है। इसकी केंद्रीय पात्र अंबपाली है लेकिन इसमें अनेकों अन्य प्रभावशाली पात्र हैं और उनसे संबंधित घटनाओं का विस्तृत चित्रण किया गया है। घटनाक्रम बहुत क्लिष्ट है लेकिन उसका वर्णन बखूबी किया गया है। राज-घरानों के भीतर छुपे रहस्यों की बुनावट, उनके प्रति पाठकों की उत्सुकता जगाए रखना, और उचित समय पर उनका उद्घाटन बहुत ही विस्मयकारी ढंग से किया गया है।
इसमें युद्ध की विभीषिका का भयावह रूप दिखाया गया है। महासमर्थ मागध सैन्य चमत्कारिक रूप से पराजित हुई थी। फिर भी, विराम-संधि पर मंत्रणा करते समय वैशाली के गणपति सुनंद ने पूर्ण परिपक्वता दिखाते हुए कहा, “भंतेगण सुनें, आयुष्मान मगध में एक स्वतंत्र गणतंत्र स्थापित किया चाहता है। गण-शासन का मूल मंत्र गण-स्वातंत्र्य है; यह शासन नहीं, व्यवस्था है जिसका दायित्व प्रत्येक सदस्य पर है। वास्तविक अर्थों में गणतंत्र में राजा भी नहीं है। प्रजा भी नहीं है। गण का संपूर्ण स्वामी गण है और गणपरिषद उसका प्रतिनिधि।”
लेखक ने कई वर्षों तक बौद्ध, जैन और आर्यों के साहित्य का गहन अध्ययन किया। उसमें पूरी तरह डूबकर, अपने को भुला बैठे, सबकुछ गहरे आत्मसात् किया, गूढ़ चिंतन-मनन किया, पागलों की तरह दिन-रात स्वप्न देखे, तब जाकर यह अनुपम कृति का सृजन कर सके।
उपन्यास में चित्रित काल-खंड तब का है जब बुद्ध और महावीर एक-साथ इस पृथ्वी पर धर्म के उपदेश कर रहे थे। इसमें धर्म और दर्शन का समुचित समावेश है। और अंत में, इस दृश्य की परिकल्पना करें:
“आनंद के साथ देवी अंबपाली ने भगवान के निकट आ परिक्रमा कर अभिवादन किया और बद्धांजलि सम्मुख खड़ी हो तीन महावाक्य कहे–
बुद्धं शरणं गच्छामि!
संघम शरणं गच्छामि!
धम्मं शरणं गच्छामि!
“भगवत ने उसे प्रव्रज्या दी, उपसंपदा की; और स्थिर धीर स्वर से कहा– ‘कल्याणी अंबपाली, सुन! जिन धर्मों को तू जाने कि, वह सराग के लिए हैं विराग के लिए नहीं, संयोग के लिए हैं वियोग के लिए नहीं, जमा के लिए हैं विनाश के लिए नहीं, इच्छाओं के बढ़ने के लिए हैं इच्छाओं के कम करने के लिए नहीं, असंतोष के लिए हैं संतोष के लिए नहीं, भीड़ के लिए हैं एकांत के लिए नहीं, अनद्योगिता के लिए हैं उद्योगिता के लिए नहीं, दुर्भरता के लिए हैं सुभरता के लिए नहीं; तो तू अंबपाली शुभे एकान्तेन जान कि न वह धर्म है, न विनय है, न शास्ता का शासन है।’
“कुछ देर मौन रहकर भगवत ने फिर कहा– ‘जा अंबपाली! तुझे उपसंपदा प्राप्त हो गई। अपना और प्राणिमात्र का कल्याण कर!’
“भगवत अरहन्त प्रबुद्ध बुद्ध ने इतना कह, उच्च स्वर से कहा– ‘भिक्षुओं महासाध्वी अंबपाली भिक्षुणी का स्वागत करो!’
“फिर जयनाद से दिशाएं गूंज उठीं। अंबपाली ने आंसू पोंछे। भगवत सुगत की प्रदक्षिणा की और भिक्षुसंघ के बीच में होकर पृथ्वी पर दृष्टि दिए वहां से चल दी।”
#वैशालीकीनगरवधू #आचार्यचतुरसेन
#vaishalikinagarvadhu #acharyachatursen
© जगत सिंह बिष्ट
इंदौर, मध्य प्रदेश
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈







