श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय और अप्रतिम कथा – सावन का झूला।)
☆ कथा कहानी # १२३ – सावन का झूला ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆
सावन की रिमझिम फुहारों के बीच मालती जी अपने बगीचे में तुलसी के पास दीपक जला रही थीं। तभी उनकी नजर एक अनजान लड़की पर पड़ी, जो चुपचाप बगीचे में खड़ी झूले को निहार रही थी।
मालती जी चौंक उठीं।
“कौन हो तुम? और मेरे बगीचे में क्या करने आई हो?
कुछ चुराने का इरादा है क्या?”
लड़की सहम गई। उसने दोनों हाथ जोड़ लिए।
“माफ कीजिए… मैं चोर नहीं हूँ।”
मालती जी ने गौर से देखा। लड़की के चेहरे पर मासूमियत थी। उसके कपड़ों और बातचीत से लग रहा था कि वह किसी अच्छे घर की पढ़ी-लिखी लड़की है।
“तो फिर अंदर कैसे आई?”
लड़की ने झेंपते हुए कहा, “गेट खुला था… इसलिए चली आई।”
मालतीने कहा-
“लेकिन क्यों?”
लड़की कुछ पल चुप रही। फिर उसकी आँखें झूले पर टिक गईं।
“मैं आपके बगल वाले घर में कुछ दिन पहले ही किराए से रहने आई हूँ।
सावन आया है… इस मौसम में तो हम मायके जाते थे, झूला झूलते थे, सहेलियों के साथ हँसते-गाते थे। लेकिन इस बार मायके नहीं जा पा रही हूँ।”
उसकी आवाज़ भर्रा गई।
“आज खिड़की से आपके आँगन में यह झूला दिखाई दिया। आपका इतना सुंदर बगीचा देखा तो बचपन याद आ गया। अब ऐसे बगीचे और झूले कहाँ देखने मिलते हैं?
पता नहीं क्यों… मैं खुद को रोक नहीं पाई और चली आई।”
मालती जी की कठोरता धीरे-धीरे पिघलने लगी।
लड़की ने संकोच से पूछा, “अगर आप कहें तो… क्या मैं थोड़ी देर झूला झूल सकती हूँ?”
मालती जी कुछ कह पातीं, उससे पहले लड़की ने अपने कान पकड़ लिए।
“सॉरी… मुझे बिना पूछे यहाँ नहीं आना चाहिए था। अब नहीं आऊँगी।”
वह मुड़कर जाने लगी।
“अरे, रुको बेटी!”
मालती जी की आवाज़ सुनकर लड़की रुक गई।
मालती जी झूले के पास गईं और उसके बैठने की जगह साफ करते हुए बोली—”इतने दिनों से इस झूले पर कोई बैठा ही नहीं? आज कोई बचपन की याद लेकर आया है, तो मैं उसे कैसे मना कर दूँ?”
लड़की की आँखें भर आईं।
वह धीरे से झूले पर बैठ गई। मालती जी ने उसे हल्का-सा धक्का दिया।
झूला आगे-पीछे होने लगा।
लड़की के चेहरे पर बरसों बाद बचपन लौट आया।
कुछ देर बाद वह उठी और जाने लगी।
मालती जी ने पूछा, “बेटी, कल फिर आओगी?”
लड़की ने पलटकर देखा। उसकी आँखों में आँसू थे।
“अगर… आपको बुरा न लगे तो।”
मालती जी मुस्कुराईं, मगर उनकी आँखें भी नम थीं।
“बुरा क्यों लगेगा?
यह बगीचा मेरा है, लेकिन यह झूला तुम्हारे बचपन का भी तो है। जब मन करे, चली आना।”
लड़की ने आगे बढ़कर मालती जी को गले लगा लिया।
दोनों की आँखों से आँसू बह रहे थे।
सावन की बारिश बाहर भी हो रही थी और दोनों के भीतर भी।
मालती जी ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—”बेटी, मायका दूर हो तो क्या हुआ… अब यह आँगन भी तुम्हारा है।”
लड़की ने आँसू पोंछते हुए मुस्कुराकर कहा—”और आप… मेरी अपनी मालती माँ।”
झूला अब भी धीरे-धीरे हिल रहा था।
उस दिन उस झूले पर सिर्फ एक लड़की नहीं झूली थी…
एक माँ को बेटी मिली थी और एक बेटी को अपना मायका।
© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’
जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





