श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे
कविता
☆ आज सूरज को मैंने… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆
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आज सूरज को मैंने मना कर दिया
और देखो अंधेरा घना कर दिया
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ठंड लगने लगी उनको बरसात से
मैंने बारिश को गुनगुना कर दिया…
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तेरी बाते जो दिल को जलाती रही
उन्ही बातों को ही अनसुना कर दिया
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प्यार के बदले में जो वफ़ा मांगली
ऐसा ना सोच हमने गुन्हा कर दिया
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तेरी ख़ामोशी ऐसी बला बन गयी
तुने दुश्वार मेरा जीना कर दिया
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कोई खंजर नहीं और तीर भी नहीं
अपने हातो से खुद को फ़ना कर दिया
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हरे पत्ते को पिसा ओ ज़ख़्मी हुए
उन्ही पत्तों को तुमने हिना कर दिया
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© अशोक श्रीपाद भांबुरे
धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.
मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८
≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈




