हेमन्त बावनकर
☆ लघुकथा ☆ सेवकराम की लघुकथाएं ☆
☆ शपथ ग्रहण परेड ☆
(मेरी लघुकथाओं के पात्र ‘सेवकराम’ के इर्दगिर्द रची गई कुछ लघुकथाओं को आपसे साझा करने का प्रयास।)
सीनियर सिटिज़न की बैठक में आज फिर व्हाट्स एप्प ग्रुप पर आए किसी संवेदनशील मुद्दे से संबन्धित पोस्ट को लेकर कुछ मित्रों के बीच में सामान्य चर्चा बहस में परिवर्तित होने लगी। कुलकर्णी जी और आत्माराम जी अपने अपने तर्क देते हुए एक दूसरे को गलत साबित करने का प्रयास कर रहे थे।
समय के साथ बहस तीखी होने लगी। अपने स्वभाव के अनुसार हरिलाल जी बीच बचाव करने का प्रयास करने लगे। हरिलाल और सेवकराम जी स्वयं को शांत रखते हुए ऐसी बेवजह की बहसों से दूर ही रहने का प्रयास करते थे।
आज स्थिति बिगड़ने के आसार लग रहे थे। ऐसे में सेवकराम जी को लगा कि उन्हें चलना चाहिए। वे हमेशा की तरह हाथ जोड़कर विदा लेते हुए उठे।
इस बार हरिलाल जी को उनका इस तरह जाना अच्छा नहीं लगा। उनसे रहा न गया।
“अरे सेवकराम जी, थोड़ा रुक जाइए। आप ऐसे नहीं जा सकते।“
“हरिलाल भाई, क्या करूँ मैं रुक कर? मेरी बात तो किसी को अच्छी लगेगी नहीं।“
उनके इस बदले हुए व्यवहार को देख कर थोड़ी देर के लिए सभी शांत हो गए।
हरिलाल जी, कुलकर्णी जी और आत्माराम जी की ओर देखते हुए बोले – “अरे नहीं सेवकराम जी, आप तो बोलिए। हम सुन रहे हैं।“
सेवकराम जी वापस बेंच पर बैठते हुए बोले – “क्या आप लोगों ने कभी शपथ ग्रहण परेड के बारे में सुना है?
लगभग सभी के मुंह से एक साथ निकला – “नहीं”
अब सभी की दृष्टि सेवकराम जी की ओर थी। सेवकराम जी ने इत्मीनान से कहना शुरू किया।
“हम सभी ने राजनेताओं को मंत्री पद और विधानसभा/संसद सदस्यों को शपथ लेते हुए देखा है। किन्तु, शायद ही किसी को सैनिकों या सेना के अफसरों के पास-आउट परेड और शपथ/कसम परेड को देखने या जानने का अवसर मिला होगा। हम लोग सोशल मीडिया के संदेशों को सच मान कर आपस में वैमनस्य पैदा कर लेते हैं। लेकिन सेना और अनुशासित सैन्य जीवन से प्रेरणा क्यों नहीं लेते?”
कुलकर्णी जी बोले – “हम समझे नहीं।“
सेवकराम जी ने सविस्तार बताने का प्रयास किया।
“भारतीय सेना में सभी धर्मों के धार्मिक शिक्षक या रिलिजियस टीचर (पंडितजी, ज्ञानी जी, पादरी, मौलवी, बौद्ध गुरु आदि) होते हैं जो कि जूनियर कमीशण्ड ऑफिसर (JCO) रेंक के होते हैं। प्रत्येक सैनिक किसी भी धर्म को मानने के लिए स्वतंत्र हैं। सैनिक प्रारम्भिक प्रशिक्षण सफलतापूर्वक उत्तीर्ण करने पर ‘पासिंग आउट परेड’ के दौरान शपथ ग्रहण करते हैं। सभी धार्मिक शिक्षक उन्हें अपने-अपने धार्मिक ग्रंथ की शपथ दिलाते हुए संविधान और राष्ट्र के प्रति कर्तव्य की शपथ दिलाते हैं। उदाहरण हमारे सामने है कि किस तरह हमारे वीर सैनिक अपने-अपने धर्म का सम्मान करते हुए धर्म, जाति और संप्रदाय को भूलकर कंधे से कंधा मिलाकर राष्ट्रधर्म का पालन करते हुए हमारी और राष्ट्र की सुरक्षा करते हैं। और यहाँ हम जाने अनजाने लोगों और असामाजिक तत्वों द्वारा फैलाये गए व्हाट्सएप्प संदेशों पर बिना अपने विवेक का उपयोग किए विश्वास कर लेते हैं। फिर बेवजह की बहस कर समय बर्बाद करते हैं और आपसी संबंध खराब करते हैं। आंतरिक सुरक्षा को कमजोर करते हैं। सर्वधर्म समभाव की विचारधारा के साथ इतना समय यदि हम अपने घर परिवार, समाज और अपने आसपास कॉम्प्लेक्स/सोसायटी के परिवार की बेहतरी के लिए दें तो कैसा रहेगा? प्रत्येक व्यक्ति किसी भी धर्म या संप्रदाय को मानने के लिए स्वतंत्र है। आगे आप की इच्छा। सभी समझदार हैं। काश हमें भी नागरिकता की शपथ दिलाई गई होती।”
इतना कह कर वे हाथ जोड़कर उठे और घर की ओर चल दिये।
और सब अवाक एक दूसरे का मुंह देखने लगे।
© हेमन्त बावनकर
21 जून 2025, 11.50 रात्रि
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





वाह बेहतरीन यथार्थ अभिव्यक्ति
Ye he nationalism,,, Dharm ko hrudalaya me rakho..or her Dharma shanman karo ye hi Geetaji ka sar he,,,
🙏🙏
बहुत ही सुंदर और वास्तव
बहुत सुंदर कथा
बढ़िया 🎊👍
एक उत्तम और समयानुकूल रचना,
जय भारत,
जय भारतीय सैन्य बल
🇮🇳 🙏 🇮🇳 🙏
बहुत ही शिक्षाप्रद, दिल को छूने वाली रचना, बधाई हो भाई
आप सभी का हृदय से आभार
बहुत ही सुन्दर। हमारे यहां हर रोज ऐसा होता है। किसी न किसी पोस्ट पर बहस। पर यह सार्थक रही। बधाई।
एक सार्थक और सशक्त लघुकथा ।बधाई
श्रेष्ठ और सशक्त लघुकथा।
इस आत्मीय स्नेह के लिये आप सभी का हृदय से आभार