श्री प्रहलाद नारायण माथुर

( श्री प्रह्लाद नारायण माथुर जी  अजमेर राजस्थान के निवासी हैं तथा ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी से उप प्रबंधक पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। आपकी दो पुस्तकें  सफर रिश्तों का तथा  मृग तृष्णा  काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुकी हैं तथा दो पुस्तकें शीघ्र प्रकाश्य । आज से प्रस्तुत है आपका साप्ताहिक स्तम्भ – मृग तृष्णा  जिसे आप प्रति बुधवार आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता हर फूल में महक हो जरूरी नहीं. 

 

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☆ साप्ताहिक स्तम्भ – मृग तृष्णा # 4 – हर फूल में महक हो जरूरी नहीं ☆

 

हर फूल में महक हो यह कोई जरूरी नहीं,

बस खिल कर किसी के काम आ जाए यह क्या कम है?

 

हर फूल का इत्र बने यह कोई जरूरी नहीं,

बस खिल कर बगिया को रोशन कर दे यह क्या कम है?

 

हर फूल बगिया को रोशन करे यह जरूरी नहीं,

भगवान के चरणों में जगह पा धन्य हो जाए यह क्या कम है?

 

हर फूल मंदिर में चढ़ पवित्र हो जाए यह जरूरी नहीं,

किसी तस्वीर पर चढ़ लोगों की आंखे नम कर दे यह क्या कम है?

 

हर फूल तस्वीर पर चढ़े यह भी कोई जरूरी नही,

फूल खिलकर बगियाँ को रंग-बिरंगा कर दे यह क्या कम है?

 

हर फूल पर कांटों का पहरा हो यह कोई जरूरी नही,

रंग बिरंगे फूल फिजा में खुशबू फैला दे यह क्या कम है?

 

© प्रह्लाद नारायण माथुर 

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2 Comments
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Shekhar Palkhe
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बहुत सुंदर रचना!!!

प्रहलाद
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जी बहुत धन्यवाद।