हेमन्त बावनकर

☆ “पंख…!” (मराठी कविता) – सुश्री प्रभा सोनवणे  ☆ (हिन्दी भावानुवाद) हेमन्त बावनकर ☆

सुश्री प्रभा सोनवणे

सुश्री प्रभा सोनवणे जी की मराठी कविता “पंख…!” पढ़ने के लिए कृपया यहाँ क्लिक कीजिए 👉 मराठी साहित्य – मराठी कविता ☆ पंख… ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

पंख…!

बहुत पहले काट दिए थे तुमने,

मेरे पंख,

कहीं मैं दूर न उड़ जाऊँ इसलिए,

किन्तु न जाने किस शक्ति से,

मैं उड़ सकी —

तुम्हारी इच्छा के विरुद्ध… पता नहीं!

 

तब वह मेरा विद्रोह ही था,

औरत को चार दीवारी में

कैद करने वाली

पुरुष प्रधान संस्कृति के विरुद्ध!

याद आता है किसी

हिंदी फिल्म का डायलॉग,

“शरीफ खानदान की औरतें,

घर की चार दीवारी को

कैद नहीं माना करती!”

 

किन्तु, मैंने पार किया चौखट,

खुद को सिद्ध करते हुए,

कहीं अंदर से खुश हो रही थी,

वर्ष १९७५ की,

मेरी स्त्री मुक्ति की कविताओं को

जागृत करते हुए!

 

लेकिन इस सांझ वेला में,

जब तुम रोगग्रस्त हो,

तुमने नहीं काटे मेरे पंख…

जबरन कैद करने का फरमान सुनाकर,

और उसे एक नाम दे दिया

सीधा सादा भोला सा

पतिव्रता धर्म!

अब मेरा तेज भी ढल गया है,

और मैंने भी—

भीतर से अपने घर के

सारे दरवाजे बंद कर लिए हैं!

 

यह प्रायश्चित है या पराजय?

अपने स्त्रीत्व का!!

पता नहीं!

भावानुवाद – हेमन्त बावनकर

पुणे 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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Prabha Sonawane
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धन्यवाद भाईसाब, बहुत सुंदर अनुवाद

Pravin Raghuvanshi
0

बहुत सुंदर एवं भावपूर्ण कविता

जगत सिंह बिष्ट
0

🌷

Dr Bhavna Shukla
0

वाह बेहतरीन अभिव्यक्ति

सत्येंद्र सिंह
0

बहुत सुंदर कविता और दर्द प्रस्तुति।

Leena kulkarni
0

बहुत बढिया