श्री यशोवर्धन पाठक
☆ पुस्तक चर्चा ☆ प्रेयसी (काव्य-संग्रह) – डा. विजेन्द्र उपाध्याय ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆
☆ डा. विजेन्द्र उपाध्याय की काव्य कृति – “प्रेयसी” – श्री यशोवर्धन पाठक ☆
काव्य में श्रृंगार को रसराज कहा गया है। रसोद्रेक में श्रृंगार की सत्ता सर्वोपरि है और इसी श्रृंगार को लेकर हिन्दी के चर्चित कवि डा . विजेन्द्र उपाध्याय की काव्य कृति प्रेयसी ने पिछले दिनों पाठकों के बीच अपनी पठनीयता और लोकप्रियता दोनों ही सिद्ध की है ।काव्य संग्रह प्रेयसी मध्य राज्य विद्युत मंडल के विधि अधिकारी एवं जबलपुर के गुप्तेश्वर क्षेत्र के निवासी डॉ. विजेंद्र उपाध्याय का स्वयं के द्वारा अनुभूत एवं उनकी लेखनी से निसरित श्रंगारिक कविताओं का एक मनभावन काव्य गुलदस्ता है,जिसमें उन्होंने अपने जीवन में अनुभूत अनुरागात्मक पलों को काव्य में तब्दील करके सुंदर शब्द विन्यास प्रदान किया है और प्रेयसी के रूप में काव्य रसिकों के समक्ष परोसा है ।इसी रस का आश्रय लेकर डॉ. विजेंद्र उपाध्याय जी ने अपनी रागात्मक एवं प्रणयधर्मी अनुभूतियों को काव्यात्मक अभिव्यक्ति देकर संस्कारधानी जबलपुर के कवि समाज में सृजनात्मक संभावनाओं के साथ विश्वसनीय उपस्थिति दर्ज कराई है ।आपकी यह प्रथम गीत कृति प्रेयसी यद्यपि विविध वर्णी रचनाओं का संकलन है।जिसमें गीत, गजल, दोहे छणिकाऐं एवं मुक्त छंद की शैली में शिल्पित रचनाएं सम्मिलित है। कुछ रचनाओं को छोड़कर शेष सभी रचनाएं कवि ने अपनी प्रेयसी को संबोधित करते हुए लिखी है। जिसमें कवि की रागात्मकता स्वकीयक एवं परकीयक बोध से परे है ।यह सीमा रेखा स्वयं पर और पत्नी पर किए गए कटाक्ष परक हास्य गीत में ही दिखाई देती है।अन्यथा पूरी रचनाएं तमाम प्रियाओं को ही अभिप्रेय हैं ।
इस संकलन में प्राय: रचनाओं में कवि ने अंतर्मन की कोमल भावनाओं और अनुभूतियों को अत्यंत सहज निश्छल एवं रंजकत्व के साथ प्रगट किया है। कवि श्री विजेंद्र उपाध्याय ने अपनी प्रेयसी को सदैव स्नेह और करुणा की मूर्ति के रूप में देखा है। जिस प्रकार संसार के सभी सुखों की प्राप्ति का वे अनुभव करते हैं, वह सब एक प्रेयस को अपनी प्रेयसी के अक्ष में दिखता है।यथा–
स्नेहावरदा,नेहदा, स्नेहसिक्त, स्वस्नेहिल,
स्नेह करुणा की प्रमूर्ति,तुम मेरी एक मात्र मंजिल ।
मीन अक्षों से सुशोभित, मोदमय सौगात प्रेमिल,
तुमको पाकर दो जहां के, सर्व सुख सौभाग्य हासिल ।
अपनी प्रेयसी को पाने की तड़पन जब प्रयासों की पराकाष्ठा तक पहुंच जाती है और मिलने पर उसकी ओर से उपेक्षा भाव देखने मिलता है,तब कवि बरबस उपालंभ सहित कह उठता है–
मिले थे बाद महीना के आज रस्ते में,
फिर एक बार मुझे मुड़ के देख तो लेते।
हजार जख्म मेरे दिल के भर गए होते,
गर एक पल के लिए मुड़ के देख तो लेते ।
प्रिया के रूठने में भी एक सुखानुभूति होती है । कवि उन मान-मनौअल के मोहक क्षणों को भला कैसे भूल सकता है। पंच-सितारा संस्कृति के रसग्य उपभोक्ता भी तथाकथित प्रगतिशीलता का मुखौटा लगाकर सनातन सत्य को नकारने का विभ्रम पाले हुए हैं किंतु जब तक मानव के हृदय में रागात्मकता जीवित है तब तक श्रृंगार प्रधान रचनाएं सृष्टि की प्रकृति प्रदत्त सुषमा का जय घोष करती रहेंगी।इस संग्रह की सभी रचनाओं का मूल स्वर प्रेम ही है।
किंतु खजुराहो की ऐतिहासिक पाषाण शिल्पों के परिपेक्ष में कवि की दार्शनिक सोच परिपक्वता के साथ मुखरित हुई है जिन्हें देखकर कवि के श्रेष्ठ साजन की संभावनाओं की आश्वस्ती मिलती है ।मैं कविवर श्री विजेंद्र उपाध्याय के उज्जवल भविष्य की कामना करते हुए उन्हें इस कृति के लिए बधाई देता हूं एवं शुभकामनाएं प्रेषित करता ह।
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© श्री यशोवर्धन पाठक
पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान, जबलपुर
संपर्क – डा. मिली गुहा अस्पताल के पीछे, गुप्तेश्वर, जबलपुर, मोबाइल 9407059752
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈







