जगत सिंह बिष्ट
(मास्टर टीचर : हैप्पीनेस्स अँड वेल-बीइंग, हास्य-योग मास्टर ट्रेनर, लेखक, ब्लॉगर, शिक्षाविद एवं विशिष्ट वक्ता)
☆ पुस्तक चर्चा 👟शू डॉग 👟SHOE DOG ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆
👟शू डॉग 👟SHOE DOG
जब व्यापार एक अर्थपूर्ण दौड़ बन जाता है 👟
कुछ आत्मकथाएँ हम प्रशंसा के भाव से पढ़ते हैं। कुछ जिज्ञासा से। और कुछ विरल पुस्तकें ऐसी होती हैं जिन्हें हम पढ़ते नहीं, जीते हैं — धड़कन दर धड़कन, संशय दर संशय।
मेरे लिए शू डॉग ऐसी ही पुस्तक रही।
मैं आत्मकथाएँ पढ़ना बहुत पसन्द करता हूँ। वे हमें किसी मनुष्य के भीतर बैठकर उसकी सफलताओं ही नहीं, उसकी शंकाओं और असफलताओं को भी सुनने का अवसर देती हैं। पर यह संस्मरण कुछ अलग है। यह किसी शिखर पर खड़े विजेता का चमकदार भाषण नहीं है; यह उस व्यक्ति की आत्मस्वीकृति है जिसने यात्रा के हर मोड़ पर भय, अव्यवस्था और असुरक्षा को महसूस किया।
इसीलिए यह पुस्तक स्मृति में बस जाती है।
बिना कवच की कहानी 👟
अक्सर उद्यमियों की कथाएँ पढ़ते समय लगता है मानो सफलता उनके लिए नियति थी। पर इस संस्मरण में Phil Knight उस मिथक को तोड़ देते हैं।
यह यात्रा सुघड़ और सुव्यवस्थित नहीं है। यह उलझनों से भरी है, जोखिमों से लदी हुई है। बार-बार धन की कमी, बैंक की चेतावनियाँ, माल की आपूर्ति में अड़चनें, प्रतिस्पर्धा का दबाव — सब कुछ जैसे एक साथ सिर पर टूट पड़ता है।
फिर भी, वर्णन में कहीं भी अहंकार नहीं है। कोई आत्मप्रशंसा नहीं।
इसके विपरीत, एक ईमानदार स्वीकार है — डर का, असुरक्षा का, असफलताओं का। वे बताते हैं कि कितनी बार लगा सब कुछ हाथ से निकल जाएगा। कितनी रातें ऐसी बीतीं जब वेतन देने का भी भरोसा नहीं था।
आज के समय में, जब लोग अपनी अजेय छवि गढ़ने में लगे रहते हैं, यह सादगी चकित करती है।
केवल जूते नहीं, रिश्ते भी 👟
यह पुस्तक Nike की स्थापना की कथा अवश्य है, पर उससे कहीं अधिक है। यह एक ऐसे ‘शू डॉग’ की कहानी है जिसे दौड़ से प्रेम था — खिलाड़ियों के पैरों की थाप से, उनके परिश्रम से, उनकी लगन से।
खेल उनके लिए केवल व्यवसाय नहीं था, एक साधना था।
पर उससे भी अधिक मार्मिक है परिवार और सहकर्मियों के प्रति उनका स्नेह।
प्रारम्भिक टीम किसी कम्पनी के कर्मचारी नहीं, बल्कि एक स्वप्न के सहयात्री लगते हैं। उनमें कमियाँ भी हैं, सनक भी है, पर एक गहरा विश्वास भी है।
पुस्तक पढ़ते हुए लगता है कि यह कहानी लाभ और हानि से अधिक, भरोसे और साथ की है।
धन नहीं, अर्थ की तलाश 👟
मुझे सबसे अधिक जिस बात ने छुआ, वह यह कि उनका स्वप्न धन अर्जित करना नहीं था।
वे लिखते हैं कि वे दुनिया पर कोई छाप छोड़ना चाहते थे। वे जीतना चाहते थे — या शायद केवल हारना नहीं चाहते थे। और जब वे दौड़ते थे, जब फेफड़े फैलते थे और पेड़ हरे धुँधले आकार में बदल जाते थे, तब उन्हें जीवन का स्वरूप दिखता था — खेलना।
“खेल” — यह शब्द इस पुस्तक की आत्मा है।
यह हमें याद दिलाता है कि जीवन का सर्वोत्तम रूप वही है जिसमें हम पूरी तन्मयता से लगे हों। जहाँ काम बोझ नहीं, गति हो। जहाँ संघर्ष भी जीवंतता का प्रमाण हो।
शायद यही एकमात्र सलाह 👟
1962 की एक सुबह उन्होंने स्वयं से कहा —
लोग तुम्हारे विचार को पागलपन कहें, कहने दो। बस चलते रहो। रुकना मत। यह भी मत सोचो कि ‘वहाँ’ कहाँ है। जो भी हो, चलते रहो।
मुझे लगता है, यही वह सलाह है जो हम सबको चाहिए।
हम अक्सर मंज़िल को लेकर इतने व्यस्त रहते हैं कि यात्रा भूल जाते हैं। हम ‘वहाँ’ की परिभाषा तय करने में ही थक जाते हैं। पर सच्ची परीक्षा तो निरन्तर चलते रहने में है — जब रास्ता धुँधला हो, जब संसाधन कम हों, जब लोग आशंका से भरी नज़रें डालें।
चलते रहो।
अहंकार से नहीं, धैर्य से।
अंधी जिद से नहीं, आस्था से।
एक-एक क़दम।
अन्ततः विजय क्या है? 👟
अन्तिम पृष्ठ पर पहुँचकर मुझे लगा कि मैंने किसी ब्राण्ड की सफलता नहीं पढ़ी, बल्कि एक युवा की जिद पढ़ी है — जो तब तक दौड़ता रहा जब तक उसकी साँस और संकल्प साथ रहे।
शायद जीवन भी यही है।
हमें सम्पूर्ण स्पष्टता नहीं चाहिए।
हमें सबकी स्वीकृति नहीं चाहिए।
हमें केवल अगला क़दम उठाने का साहस चाहिए।
फिर अगला।
फिर अगला।
इसी तरह एक ‘शू डॉग’ ने अपनी पहचान बनाई।
और शायद इसी तरह हम भी अपने जीवन की पगडंडी पर कोई अर्थपूर्ण निशान छोड़ सकते हैं। 👟
© जगत सिंह बिष्ट
इंदौर, मध्य प्रदेश
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






