श्री जयपाल

(सुप्रसिद्ध लेखक श्री जयपाल जी पंजाब शिक्षा विभाग से सेवानिवृत्त अध्यापक हैं। आपका एक कविता संग्रह ‘दरवाजों के बाहर‘  आधार प्रकाशन  से प्रकाशित। (इस संग्रह पर कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र में शोधकार्य), कुछ कविताएं पंजाबी में  अनुदित (पुस्तक रूप में प्रकाशित)।पत्र-पत्रिकाओं में लगातार रचनाएं प्रकाशित। देस-हरियाणा पत्रिका (कुरुक्षेत्र) के सह संपादक  प्रदेशाध्यक्ष- जनवादी लेखक संघ हरियाणा।

आज प्रस्तुत है श्री जयपाल जी द्वारा  सुश्री मनजीत मानवी  जी के काव्य संग्रह “बूंद बूंद शब्द” पर सार्थक विमर्श ।

☆ “बूंद बूंद शब्द” (काव्य संग्रह) – सुश्री मनजीत मानवी  ☆ पुस्तक चर्चा – श्री जयपाल ☆

पुस्तक —  बूंद बूंद शब्द [ काव्य संग्रह ]

लेखिका — मनजीत मानवी [9896850047]

कीमत — 295/- [पेपर बैंक]

प्रकाशक — ‘आथर्स प्रेस,  नई दिल्ली

कविता और व्यथा का अंतरंग रिश्ता – श्री जयपाल ☆

मैं लिखती हूँ कि

अब बदले दुनिया

अन्तिम व्यक्ति के हक में

 

मैं लिखती हूँ कि

सपनों की घुटन

नहीं और  समा सकती मन में

 

मैं लिखती हूँ कि

खुद का अपना दावा

मैं पेश करूँ हर सूरत में

उपरोक्त पंक्तियाँ है—‘बूद बूंद शब्द’–कविता-संग्रह की एक कविता से । कविता संग्रह है मंजीत मानवी का । इन पंक्तियों में जीवन के प्रति जैसी जिजीविषा दिखाई देती है, जीवन जीने की उत्कट लालसा जैसी इन पंक्तियों में मौजूद है,वैसी ही जीवन की धड़कन इस संग्रह की हर कविता में सुनी जा सकती है–‘

कभी कोई बूंद

मेरी पीर लिए

बरसे वहां

तुम हो जहां

 

कभी कोई पत्ता

तेरी प्रीत लिए

यूं सरसराए

कि तुम आए !

निश्छल प्रेम से लबालब इन कोमल भावनाओं को समर्पित है यह काव्य-संग्रह । इसका एहसास पाठक को हर पन्ने पर कविताओं को पढ़ते हुए होता है l दरअसल  कवयित्री के काव्य सरोकार और जीवन सरोकारों को अलग अलग नहीं किया जा सकता । उनके जीवन आदर्श और जीवन संघर्ष दोनों इन कविताओं के असली सर्जक हैं । जीवन से प्यार और जीवन से संघर्ष-यही है इन कविताओं का सारांश—

ऊपर से कठोर

उलझी

सुप्त

भीतर से उजली

स्पष्ट

तृप्त….

 

बहुत दिन हुए

कोई चेहरा नहीं देखा

दर्द की लौ से

साबुत और रोशन

कवयित्री महिला-जनान्दोलनों से जुड़ी रही है । एक स्त्री की मानसिक पीड़ा और उसके संघर्ष को बड़ी शिद्दत के साथ महसूस करती है l अंतिम व्यक्ति के साथ  अंतिम स्त्री के दर्द और संघर्ष को भी अपनी कविताओं में अभिव्यक्ति देती है–

मेहरबानी की

जूठन पर पलती

वह अंतिम स्त्री भी

चाहती है

पंख पसार के जीना..

 

पांव में छाले हैं

सर पर मैला

महिला के प्रति पुरुषवादी-पितृसत्तात्मक रवैये को वह महिला शोषण का एक हथियार करार देती है जो महिला को मात्र एक शरीर समझता है और उसकी गरिमा और सम्मान को कोई महत्त्व नहीं देता–

मेरा शरीर

तुम्हारे खेल का

मैदान नहीं

 

न ही तुम्हारी

सत्ता का

तुच्छ गलियारा

कवयित्री दलित स्त्री, मजदूर स्त्री, गुलाम स्त्री, बलात्कृत स्त्री, पितृसत्ता/ पुरूष सत्ता की शिकार स्त्री आदि स्त्रियों के सामाजिक उत्पीड़न के खिलाफ सीधे विद्रोह का आह्वान करती है कि इस व्यवस्था को अब बदलना ही  होगा, इसे अब और  सहन नहीं किया जा सकता ।

प्रबुद्ध और प्रतिबद्ध कवयित्री शुभा  मनजीत की काव्य कला पर अपनी  सारपूर्ण टिप्पणी में कहती हैं– ‘सरल प्रवाहमयी भाषा, मार्मिक बिम्ब और उपमाएं, प्रतिगामी सामाजिक ढांचों,शास्त्रों के प्रतिरोध में चिन्हित की गई विषय वस्तु और एक तरह की गीतात्मकता मनजीत की लेखन शैली की विशेषता है …..।’

कवयित्री न केवल सामाजिक संबंधों  और अंतरंग मानवीय रिश्तों के प्रति संवेदनशील है बल्कि वह शब्दों के प्रयोग के प्रति भी उतनी ही संवेदनशील है। शब्दों की मितव्ययिता सभी कविताओं की विशेषता है। शब्दों और वाक्यों की तराश कविताओं को गंभीरता प्रदान करने में सफल रही हैं l

मनजीत स्वयं स्वीकार करती हैं–

कितना अंतरंग रिश्ता है

कविता और व्यथा का

 

छंदों की आत्मा में

अनायास ही

घुल मिल जाता है

इस दौर की आर्थिक/सामाजिक, राजनीतिक/साँस्कृतिक विकृतियों के विरोध में खड़ी और गहरे मानवीय सरोकारों की पक्षधर इन कविताओं को पढ़ा जाना बहुत जरूरी है।

© श्री जयपाल 

संपर्क- 112-ए /न्यू प्रताप नगर, अम्बाला शहर( हरियाणा)-134007 – फोन-94666108

jaipalambala62@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments