श्री संजय भारद्वाज
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )
☆ संजय दृष्टि – संतृप्त ☆
दुनिया को जितना देखोगे
दुनिया को जितना समझोगे,
दुनिया को जितना जानोगे
दुनिया को उतना पाओगे,
अशेष लिप्सा है दुनिया,
जितना कंठ तर करेगी
तृष्णा उतनी ही बढ़ेगी,
मैं अपवाद रहा
या शायद असफल,
दुनिया को जितना देखा
दुनिया को जितना समझा
दुनिया में जितना उतरा,
तृष्णा का कद घटता गया,
भीतर ही भीतर एक
संतृप्त जगत बनता गया।
© संजय भारद्वाज
(रात्रि 12:25 बजे, 16.6.2019)
☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
writersanjay@gmail.com
9890122603





बहुत सुंदर अभिव्यक्ति
अप्रतिम। जितना जगत को जाना तृष्णा का कद घटता गया ,भीतर एक संतृप्त जगत बनता गया।साधुवाद।
आंतरिक संतृप्त जगत की निर्मिति के लिए साधुवाद , बस तृष्णा का कद घटता जाए ……