श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका व्यंग्य – “सटायर और रिटायर…“।)
अभी अभी # ८३८ ⇒ व्यंग्य – सटायर और रिटायर
श्री प्रदीप शर्मा
सटायर कभी रिटायर नहीं होती। रिटायर होना, जिंदगी की सबसे बड़ी सटायर है। रिटायर होना पहले टायर होना है और उसके बाद सटायर होना है। टायर जीवन का पहिया है, जो हमेशा बाबू बनकर दफ्तर की जिंदगी की गाड़ी में जुता रहता है। जब थक जाता है, सटायर हो जाता है, दफ्तर से रिटायर हो जाता है।
जब बड़े बाबू रिटायर होते हैं, उनकी कलम थक जाती है। जीवन भर, जब तक उनकी कलम चली नहीं, फाइल अपनी जगह से हिली नहीं। कलम ही उनका जीवन का पहिया था, जो टायर का काम करता था। उनकी टीप से ही फाइल यहां से वहां जाया करती थी। अपना वक्त जाया किया करती थी। बड़े बाबू कभी थके नहीं, फाईल कभी नहीं थकी। अचानक जीवन सटायर हो गया, बड़ा बाबू रिटायर हो गया।।
जीवन में संगति है तो गति है। गीत है, संगीत है। आशा, उम्मीद, उत्साह, उमंग, जोश जीवन के पहिये हैं, जिन पर चलकर ही इंसान आगे बढ़ता है। चलना जिंदगी की निशानी, रुकना टायर के रिटायर होने की निशानी। कबीर की एक और ताजी उलटबासी! जो कभी थके नहीं, हमेशा चलता रहे, फिर भी नाम टायर यानी थकेला। व्हाट अ सटायर!
बेचारा थका है, टायर है, फिर भी चल रहा है। हम सब थके हुए टायर हैं, फिर भी चल रहे हैं। टायर नहीं, रिटायर हूं मैं। यानी करेला और नीम चढ़ा। नीम की उम्र बड़ी होती है, करेले की कम होती है। यह सटायर कभी कड़वी नीम है तो कभी मीठी। करेले की तरह नहीं, नीम की तरह रिटायर हों। दीवाली के फरसाण की मीठी नीम हैं हम, अभंग स्नान की नीम, चंदन, केसर, तुलसी हैं हम।
हमारी विसंगति में भी गति है। रिटायर हैं हम, सटायर हैं हम। आज नहीं नीम की कड़वाहट, आज नहीं टायर की थकावट, कल के जुगनू नहीं, आज प्रकाश के पुंज हैं हम। उम्मीद के आकाश के चमकते तारे हैं हम। आज नहीं बयानबाजी, बस खुशियों की आतिशबाजी, तम की कड़वाहट दूर भगाई जाए, आज कुछ मीठा हो जाए।।
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© श्री प्रदीप शर्मा
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