श्री रमाकांत ताम्रकार
☆ व्यंग्य – व्यंग्य भाषण: बेहोशी का लोकतंत्र ☆ श्री रमाकांत ताम्रकार ☆
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भाइयों और बहनों…
आज मैं डॉक्टर बनकर आपके सामने आया हूँ. घबराइए मत इंजेक्शन नहीं लगाऊँगा बस एक बीमारी बताऊँगा
जो आप सबको है. अरे ऐसा नहीं है कि मुझे नहीं है, मुझे भी है मैं भी उससे अछूता नहीं हूं.
इस बीमारी का नाम है सुविधानुसार बेहोशी जो कोरोना से भी ज्यादा खतरनाक है. वैसे हमारे देश में आदमी मरने से नहीं डरता केवल और केवल जिम्मेदारी से डरता है!आपने भी देखा होगा बिजली का बिल भरने जाओ तो जो लोग लाइन में खड़े हैं उनमें से कई लोग 5 से 10 मिनट बाद ही कहने लगते हैं भाई साहब, चक्कर…आ…आ और… धड़ाम से ज़मीन पर गिर पड़ते है
लेकिन…यदि उन्हीं आदमियों को राशन की दुकान पर देखिए… सुबह 6 बजे से लाइन में दोपहर 2 बजे तक खडे रहेंगे तब ना चक्कर… ना दर्द…ऊपर से कहेगा देश तरक्की कर रहा है इसलिए कि उसके खून में फ्री की आदत जो हो गई है. हमारे यहाँ एक ही मेडिकल टेस्ट को पब्लिक में मान्यता हैं—
ECG को नहीं पर ेक्ग जैसा टेस्ट RCG को अर्थात राशन कार्ड ग्राफ!
अब तो गाँव गाँव में नया योग शुरू हो गया है फ्री-योग. जिसकी कल्पना सपने में भी किसी बाबा ने भी नहीं की होगी. इस फ्री योग में आदमी—धूप में तपेगा धक्का भी खाएगा फिर भी खुश रहेगा क्योंकि उसे फ्री योग की आदत जो लग गई है लेकिन जैसे ही कोई कहे – भाई, टैक्स तो भरिए… बस… फिर क्या है उसका BP डाउन होगा और वह आँखें बंद कर लेगा और सीधा बेहोशी की हालत में चला जाएगा …यही राष्ट्रीय बेहोशी है.
इस देश में अब दो ही लाइनें बची हैं—
एक जहाँ लोग खड़े रहते हैं और दूसरी जहाँ लोग गिरते रहते हैं.
आज की जनता बहुत ही स्मार्ट हो गयी है उसे सब पता है कि कहाँ क्या फ्री मिलेगा, कब मिलेगा और कैसे मिलेगा
लेकिन…उसे यह नहीं पता देश कैसे चलता है क्योंकि…कर्तव्य सुनते ही… उसका दिमाग एयरप्लेन मोड में चला जाता है.
हमारे देश में अब नेटवर्क नहीं जाता, लेकिन जिम्मेदारी आते ही दिमाग का सिग्नल चला जाता है.
अब देश दो लाइनों में बंट गया है-
पहली लाइन – अधिकार की हैं, यहाँ भीड़ है…जोश है…सेल्फी है… नारे हैं…शक्ति है.
दूसरी लाइन – कर्तव्य की हैं, यहाँ केवल पिन पटक सन्नाटा है…
और बीच-बीच में कोई कोई जमीन पर भी पड़ा मिल जाता है. लोग पूछते हैं – क्या हुआ बेचारे को?
तब जवाब मिलता है – भाई… इसे जिम्मेदारी का अटैक आया हैं.
देश में अब कोरोना नहीं फैलता… कर्तव्य रुपी बीमारी फैलती है… और जिसे लग जाती है वह तुरंत गिर जाता है.
हम सब चाहते हैं कि सड़क अच्छी हो, बिजली आए,अस्पताल ठीक हों, रहन सहन अच्छा हो प्रदूषण न हो दारु भी फ्री मिले और बीमार हो जाओ तो इलाज भी, नोकरी भी मिले मोटी तनख्वाहें वाली लेकिन टैक्स कोई और दे,नियम कोई और माने ईमानदारी कोई और दिखाए.
देश में अब नया सर्वे होना चाहिए –
कितने लोग टैक्स देते हैं और कितने लोग सिर्फ फ्री का लाभ लेते हैं अब तो सरकार भी समझदार हो गई है उसे पता है जिम्मेदारी दोगे तो जनता धड़ाधड़ गिर जाएगी और सरकार गिरा देगी और यदि फ्री योग वाली सुविधा दोगे तो जनता एक टांग पर खड़ी रहेगी. इसलिए तो देश में लोकतंत्र नहीं चल पा रहा हैं. केवल और केवल सुविधातंत्र चल रहा है. अब देश में नागरिक नहीं बन पाते सिर्फ लाभार्थी बनते हैं.
तो भाइयों और बहनों, समस्या यह नहीं है कि लोग बेहोश हो रहे हैं. समस्या यह है कि लोग सही जगह पर होश में नहीं हैं. इस देश में अब नागरिक नहीं रहते. यहाँ मौके के हिसाब से होश में आने वाली जनता रहती है. अधिकार दिखते ही उन्हें होश आ जाता है और कर्तव्य दिखते ही केवल आदमी नहीं गिरता…उसका चरित्र गिर जाता है… जिम्मेदारी गिर जाती है और पहले तो कभी-कभी देशभक्ति भी बेहोश हो जाती थी अब तो पूर्ण रूप से देश भक्ति जिम्मेदारी की बीमारी से बेहोश होकर रसातल में चली गई. जनता फ्री का योग कर रही है तो वहीं नेता, अफसर घर भरने का योग कर रहे हैं. देश जाए… भाइयों और बहिनों.
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© श्री रमाकान्त ताम्रकार
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