श्रीमती सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “सिंदूर में आशीष”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 228 ☆
🌻लघु कथा🌻 सिंदूर में आशीष🌻
मम्मी पापा बहुत ही नाज- नखरे से अपने बच्चों का परवरिश करते हैं। हर वह साधन उपलब्ध कराते हैं, जहाँ तक उनकी पहुंँच होती है। दिन-रात कड़ी मेहनत करके संतान के उज्जवल भविष्य की कामना सदैव ईश्वर से करते रहते हैं।
ऐसा ही परिवार कुसुम सोहन का। घर का वातावरण, सुंदर दो बच्चों की देखरेख, मध्यवर्ग का परिवार जैसा होता है, ठीक उसी प्रकार न ज्यादा खोने का डर, न पाने की चिंता।
बड़ा बेटा पढ़ाई के सिलसिले में बाहर गया था। शहर की हवा ऐसी लगी कि अब मम्मी-पापा पुराने ख्यालात के लगने लगे। फैशन की दुनिया में कदम रखा। छोटा बेटा अपने घर में आँखों का तारा बनकर रहा, परंतु फिर भी मां-बाप बड़े बेटे की याद में आँसू बहाते रहते।
समय किसी के लिए कहाँ रुकता है। आज घर के आँगन में बैठी मम्मी सब्जी की टोकरी के साथ अपने ख्यालों में थी। अचानक उठी और आवाज लगाई— अजी सुनते हो, चलो जल्दी से तैयार हो जाओ बेटे के पास जाना है। मन बहुत परेशान हो रहा है। पतिदेव ने पत्नी की आवाज ममत्व को व्याकुल होते देखा, जाना ही उचित समझा।
कुछ लेकर नहीं जाओगी? सुना है। उसने शादी कर लिया है। माँ ने कहा— आप चिंता ना करें। छः घंटे की सफर के बाद दरवाजे की घंटी बजी।
अस्त-व्यस्त, परेशान अपने उम्र से सयानी दिखती महिला ने दरवाजा खोला। अंदर कराहने की आवाज!!! कौन है, कौन है, शैली कोई आए हैं क्या??
अंदर ले आओ आँखे जैसे पत्थर की बन चुकी थी। समझते देर न लगी यह बहू ही है। परंतु यह क्या यह तो घर की बाई जैसे दिख रही है। इशारे को समझ वह दो गिलास पानी लेकर सिर पर पल्लू डाल ली।
माँ ने देखा दुनिया की चका चौध, फालतू के खर्चे, बीमारी से कुछ ना बचा था, नौकरी भी हाथ से निकल चुकी थी, चरणों पर वह गिर पड़ी— माँ!! मैं यहां से चली जाऊंगी। आप इन्हें घर ले जाइए इन्हें बचा लीजिए।
रोते-रोते वह बदहवास सी होने लगी। माँ ने धीरे से आँचल की गाँठ से लाल सिंदूर निकाल शैली की मांग पूरी भरते आशीषों की झड़ी लगा दी।
घर बाद में जाएंगे। चलो पहले अस्पताल चलते हैं। सब ठीक हो जाएगा।
आईने में अपने को शैली ने देखा मांग पूरी भरी हुई – – सिंदूर की लालिमा से वह आज चमक उठी है।
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© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




