श्री राकेश कुमार
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # 136 ☆ देश-परदेश – खिड़की ☆ श्री राकेश कुमार ☆
खिड़की कही भी हो अच्छी लगती है। मानव हमेशा से ही उत्सुकता लेकर जीता है। उसके मन में हमेशा एक जिज्ञासा रहती है, नया देखने, महसूस करने की। घर में भी सुबह सुबह खिड़की ही तो खोलते हैं।
रेलगाड़ी की खिड़की सपनों का दरवाजा लगती है मुझे, जब भी रेलगाड़ी में खिड़की वाली सीट मिलती है तब एक नई दुनिया में चले जाते हैं हम!
भले वह दुनिया हकीकत में कोसों दूर है लेकिन एक खिड़की हमें उस दुनिया में जीने की अनुमति देती है|
हम गुनगुनाते हैं तराने, अपना हाथ खिड़की से बाहर निकाल कर उसे हवा के साथ बहने देते हैं, पर अचानक किसी के डर से वह हाथ भीतर कर लेते हैं।
पर उस वक्त बेखबर हो जाते हैं हम, रेल गाड़ी की शोर भरी दुनिया में भी हम अपने लिए बना लेते हैं एक सपनो भरा शहर!!
हम सपने बुनने लगते हैं पर सपनों में किसी धीमी नदी के लहर से बहते चले जाते हैं, अचानक हम पाते हैं कि हमें मुस्कुरा रहे हैं। मुस्कुराहट के साथ कुछ आँसू भी चेहरे पर चिपक जाते हैं, हमें अपनी उस दुनिया में होते हैं जहा हम सच में खुश होते हैं और हम वास्तव में तब तक वास्तविक दुनिया में वापस नही आते जब तक हमारे कंधे पर किसी का हाथ आकर हमें जगा ना दे।
हवाई यात्रा में भी खिड़की की सीट किसी का जीवन रक्षक बन कर पुरानी मान्यता “जाको राखे साइयां मार सके ना कोय” को चरितार्थ करती है, को हालिया विमान दुर्घटना से साबित हो गया हैं।
© श्री राकेश कुमार
संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)
मोबाईल 9920832096
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






